दरभंगा : समुचित वर्षापात में कमी से भू गर्भीय जलस्तर का स्थिरीकरण प्रभावित हो रहा है. जलस्तर के जितने भी प्रारंभिक स्रोत – नदी, नाला, कुंआ, डबरा, मोईन, तालाब आदि विलुप्त होते जा रहे हैं. नगरीकरण विस्तार से सतही जल का संरक्षण क्षेत्र भी प्रभावित हो रहा है. वातावरण में परिवर्तन से रसायनिक आंदोलन में इसका व्यापक प्रभाव पड़ा है. दिनानुदिन जमीन के जल संग्रहण की क्षमता में कमी आ रही है.
यही वजह है कि जल ग्रहण क्षेत्र लगातार नीचे जा रहा है, जिसके कारण चापाकल सूख रहे हैं. यह मानना है भू गर्भशास्त्री व एमएलएसएम कॉलेज के भूगोल के प्राध्यापक कालीदास झा का . उन्होंने जल संग्रहण व संरक्षण विषय पर शोध कार्य किया है. डाॅ झा ने बताया कि वर्षा जलस्तर स्थिरीकरण का कारण है. दस वर्ष पूर्व सामान्य वर्षा होने पर वर्षा के जल कम से कम 60 से 65 फीसदी जमीन के नीचे जाता था.
इससे जलग्रहण क्षेत्र का स्वरूप विकसित होता था. लेकिन कालांतर में वर्षापात की कमी एवं जल दोहन की बढ़ती प्रवृत्ति जल संकट का सबसे बड़ा कारक बनता जा रहा है. उन्होंने बताया कि दिनानुदिन लोगों में जल के दुरुपयोग की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है. कुछ वर्ष पूर्व तक जो व्यक्ति 20 लीटर पानी में दिन भर का काम निबटा लेता था, उसे अब 50 लीटर में भी कमी ही दिखती है. ऐसी स्थिति में जल ग्रहण क्षेत्रों में लगातार कमी के बाद भी जल के दुरुपयोग की प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगाया गया तो अगले पांच वर्ष के बाद शहर ही नहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में भी जल संकट काफी प्रभावित करनेवाला हो जायेगा.
उन्होंने बताया कि उद्योगीकरण से जल की खपत अधिक हो रहा है. नगरीकरण विस्तार एवं गांवों में भी शहरीकरण की प्रवृत्ति से लोगों के घरों के ईद-गिर्द वर्षा जल संग्रहित होने के सभी स्रोत विलुप्त होते जा रहे हैं. ऐसी स्थिति में यदि बरसात के चार महीनों में एक हजार मिलीमीटर वर्षापात हुआ फिर भी उनके घरों के ईद-गिर्द जलग्रहण क्षेत्र में उतनी मात्रा में जल नहीं पहुंच पाता है. जबतक महाराष्ट्र की तरह यहां रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को अपनाया नहीं जायेगा, तबतक इस संकट से निदान नहीं मिल सकता.
