कैंपस- कब शुरू होगी गृह वज्ञिान में पीजी की पढ़ाई

कैंपस- कब शुरू होगी गृह विज्ञान में पीजी की पढ़ाई नामांकन से वंचित हो रही छात्राएंएमआरएम कॉलेज में 1992 के बाद बंद हुई पढ़ाईदरभंगा. लनामिवि के मुख्यालय स्थित एक मात्र अंगीभूत महिला कॉलेज में वर्षों पूर्व गृह विज्ञान में पीजी पढ़ाई होती थी. पर अब वर्षों से यहां पीजी की पढ़ाई ठप है. जबकि महिला […]

कैंपस- कब शुरू होगी गृह विज्ञान में पीजी की पढ़ाई नामांकन से वंचित हो रही छात्राएंएमआरएम कॉलेज में 1992 के बाद बंद हुई पढ़ाईदरभंगा. लनामिवि के मुख्यालय स्थित एक मात्र अंगीभूत महिला कॉलेज में वर्षों पूर्व गृह विज्ञान में पीजी पढ़ाई होती थी. पर अब वर्षों से यहां पीजी की पढ़ाई ठप है. जबकि महिला कॉलेज होने के नाते यहां इस विभाग में काफी छात्राएं पढ़ती है. इतना ही नहीं इस विषय में वे स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने से वंचित हो रही है, क्योंकि यहां विभाग में पीजी की पढ़ाई जो नहीं हो रही है. जब विवि में कहीं भी इस विषय में पीजी की पढ़ाई नहीं थी तभी यहां यह सुविधा प्राप्त थी. समस्या सिर्फ यही नहीं विवि स्तर पर गृह विज्ञान प्रतिष्ठा में प्रति वर्ष तीन हजार से अधिक छात्रा उत्तीर्ण होते हैं. वहीं वे स्नातकोत्तर पढ़ाई के इच्छुक भी होते हैं. पर सुविधा नहीं होने के कारण वे नामांकन नहीं करा पाते हैं. विवि स्तर पर विवि विभाग में मात्र इस विषय की पढ़ाई होती है, जहां 120 सीटें उपलब्ध है. सवाल उठता है कि अन्य अध्ययन के इच्छुक छात्र जाएं तो जाएं कहां? आर्थिक रूप से समर्थ छात्र-छात्राएं तो अन्य विवि में अध्ययन के लिए चले जाते हैं. पर असमर्थ छात्रों के लिए तो अपनी पढ़ाई पर ब्रेक लगाने के सिवाय कोई उपाय नहीं होता है. पूर्व में होती थी पीजी की पढाईस्थानीय एमआरएम कॉलेज में 1984 से 1992 तक गृह विज्ञान विषय में पीजी तक की पढ़ाई हुई. बताया जाता है कि उस समय यहां के अलावा अन्य कहीं भी इस विषय की पढ़ाई नहीं होती थी. तत्कालीन विभागाध्यक्ष डा. श्यामा चौधरी ही इसके बाद विवि विभाग के विभागाध्यक्ष बनीं और वहीं पढ़ाई शुरू हुई, तबसे लेकर आज तक कॉलेज में इस विषय में पीजी की पढ़ाई ठप हो गयी. क्या है समस्याविवि का प्रतिष्ठित महिला कॉलेज होने के नाते यहां छात्राओं की संख्या ज्यादा है. वहीं गृह विज्ञान विषयों में छात्राओं का अधिक झुकाव होता है. स्नातक प्रतिष्ठा स्तर पर तो वे यहां अध्ययन कर लेती हैं पर पीजी अध्ययन के लिए अन्यत्र जाने से हिचकती है. इसके पीछे सामाजिक व आर्थिक कारण भी है. वैसे विवि स्तर पर भी इस विभाग में 120 सीटें है. जबकि सिर्फ इस कॉलेज में 2014 में 88 छात्राएं उत्तीर्ण हुई. वहीं 2015 में 62 छात्राएं उत्तीर्ण हुई. वे सबके सब पीजी में नामांकन चाहती है, लेकिन नामांकन से प्रतिवर्ष अधिकांश छात्राएं वंचित हो रही है. क्या हुआ है प्रयास ऐसा नहीं कि इस कॉलेज में गृह विज्ञान की पढ़ाई की अनिवार्यता व आवश्यकता को देखते हुए तत्कालीन कुलपति डा. एसपी सिंह के कार्यकाल में पीजी पढ़ाई का सीनेट व सिंडिकेट से अनुमोदन करवाकर संचिका को उच्च शिक्षा में अनुमोदन के लिए भेजा गया. लेकिन अभी तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है. इसके बाद से विवि प्रशासन द्वारा इसके लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं किया जा सका. समस्या सिर्फ यहीं तक नहीं है. विवि के क्षेत्र अंतर्गत पड़नेवाले चार जिलों में 3 हजार से अधिक परीक्षार्थियों ने प्रथम वर्ग में प्रतिष्ठा की परीक्षा पास की है. स्वत: अंदाज लगाया जा सकता है कि 120 सीटों के अतिरिक्त कितने नामांकन के इच्छुक छात्र इससे वंचित हो रहे हैं. यदि विवि गृह विज्ञान में नामांकित छात्राओं की संख्या को देखते है तो यह स्पष्ट होता है कि प्रतिवर्ष यहां नामांकन की भीड़ होती है. 2011-13 में 140 छात्र नामांकित है. वहीं 2012-14 में 136, 2013-15 में 131 और 2014-16 में 122 नामांकित हैं जबकि स्वीकृत सीटों की संख्या 120 है.क्या कहते है प्रधानाचार्यएमआरएम कॉलेज के प्रधानाचार्य डा. विद्यानाथ झा कहते है कि उक्त विषय में पीजी की पढ़ाई नहीं होने से प्रतिवर्ष कई छात्राएं स्नातकोत्तर अध्ययन की इच्छा रखते हुए भी ऐसा नहीं कर पाती हैं. कॉलेज द्वारा कई बार प्रयास किया जाता रहा है फिर भी परिणाम सकारात्मक नहीं रहा है. वैसे पढ़ाई की आवश्यकता व अनिवार्यता है.

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