Cyber Security: अब बुजुर्गों को आसानी से नहीं फंसा पाएंगे साइबर ठग, जानिए कैसे काम करेगा डुअल OTP सिस्टम

Cyber Security: डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी से बुजुर्गों को बचाने के लिए डुअल ओटीपी सिस्टम महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच बन सकता है. दो स्तर के सत्यापन से साइबर अपराधियों के लिए बैंक खातों से रकम निकालना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो जाएगा. पढे़ं पूरी खबर…

Cyber Security: देशभर में बढ़ते साइबर अपराध और खासकर बुजुर्गों को निशाना बनाकर किए जा रहे डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों के बीच सीनियर सिटीजन के लिए एक नई सुरक्षा व्यवस्था चर्चा में है. साइबर सुरक्षा को मजबूत बनाने के उद्देश्य से बैंकिंग लेन-देन में ‘डुअल ओटीपी सिस्टम’ को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे बुजुर्ग खाताधारकों को अतिरिक्त सुरक्षा मिल सकेगी. गृह मंत्रालय की ओर से भी समय-समय पर ऐसे साइबर फ्रॉड से सतर्क रहने की सलाह दी जाती रही है.

अक्सर खुद को अधिकारी बता डराते हैं ठग

साइबर अपराधी अक्सर खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर बुजुर्गों को डराते हैं. कई मामलों में लोग घबराकर ओटीपी, बैंकिंग जानकारी या रकम अपराधियों के बताए खाते में ट्रांसफर कर देते हैं. ऐसे में डुअल ओटीपी सिस्टम सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत के रूप में काम कर सकता है.

क्या है डुअल OTP सिस्टम?

इस व्यवस्था के तहत बैंकिंग ट्रांजैक्शन के दौरान सिर्फ एक नहीं बल्कि दो स्तर पर सत्यापन किया जाता है.

  • पहला ओटीपी खाताधारक के रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर भेजा जाता है.
  • दूसरा ओटीपी उस भरोसेमंद परिवार सदस्य या नॉमिनी के मोबाइल नंबर पर भेजा जाता है, जिसे बैंक रिकॉर्ड में दर्ज किया गया हो.

ट्रांजैक्शन पूरा करने के लिए दोनों ओटीपी का सत्यापन जरूरी होता है. यदि किसी एक ओटीपी की पुष्टि नहीं होती है तो लेन-देन पूरा नहीं हो पाता.

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डिजिटल अरेस्ट जैसे फ्रॉड में कैसे करेगा मदद?

साइबर अपराधी अक्सर फोन पर दबाव बनाकर बुजुर्गों से ओटीपी हासिल कर लेते हैं. लेकिन यदि ट्रांजैक्शन के लिए दूसरे ओटीपी की भी जरूरत होगी, तो परिवार के सदस्य की जानकारी के बिना रकम निकालना या ट्रांसफर करना मुश्किल हो जाएगा.

इससे संदिग्ध लेन-देन की स्थिति में परिवार को अलर्ट मिलने का समय भी मिलेगा और वे समय रहते हस्तक्षेप कर सकेंगे.

बड़े लेन-देन पर मिलेगी अतिरिक्त निगरानी

विशेषज्ञों का मानना है कि दोहरी सत्यापन प्रक्रिया बड़े और संदिग्ध ट्रांजैक्शन पर सुरक्षा कवच का काम कर सकती है. इससे परिवार के सदस्य खाते में होने वाली गतिविधियों पर नजर रख सकेंगे और किसी भी असामान्य गतिविधि की जानकारी तुरंत प्राप्त कर सकेंगे.

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मुजफ्फरपुर में सामने आ चुके हैं कई मामले

हाल के महीनों में मुजफ्फरपुर में डिजिटल अरेस्ट के कई बड़े मामले सामने आए हैं. आमगोला निवासी एक रिटायर्ड बैंक मैनेजर से 67 लाख रुपये, भगवानपुर निवासी 70 वर्षीय बुजुर्ग से 18.25 लाख रुपये और एक सेवानिवृत्त बिजलीकर्मी से 17 लाख रुपये की साइबर ठगी की घटनाएं सामने आ चुकी हैं. इन मामलों ने बुजुर्गों की साइबर सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है.

क्या करें सीनियर सिटीजन?

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसी भी अनजान कॉल पर ओटीपी, बैंक डिटेल या व्यक्तिगत जानकारी साझा न करें. यदि बैंक ऐसी अतिरिक्त सुरक्षा सेवाएं उपलब्ध कराता है, तो उसे सक्रिय कराने पर विचार करें. किसी भी संदिग्ध कॉल की सूचना तुरंत 1930 साइबर हेल्पलाइन या नजदीकी साइबर थाना को दें.

मुजफ्फरपुर से चंदन सिंह की रिपोर्ट

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लेखक के बारे में

By Aniket kumar

अनिकेत बीते 4 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. राजस्थान पत्रिका और न्यूजट्रैक जैसे मीडिया संस्थान के साथ काम करने का अनुभव. एंटरटेनमेंट, हाईपरलोकल और राजनीति की खबरों से अधिक जुड़ाव. वर्तमान में प्रभात खबर की डिजिटल टीम के साथ कार्यरत.
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