Biharsharif News : सावन आते ही नालंदा के बाजार गेरुआ रंग में रंग जाते हैं. शिवभक्तों के लिए गेरुआ कपड़े, कांवड़, बोल बम लिखी टी-शर्ट, भगवान भोलेनाथ की तस्वीर वाली गंजी, गमछा, साफी, झोला, कुर्ता, लोअर और मनी बैग की मांग बढ़ जाती है. बाजार के रुझानों, वस्तुओं की सामान्य कीमतों और अनुमानित खरीदारी के आधार पर वर्ष 2026 में सावन के दौरान जिले में शिवभक्तों के वस्त्र और संबंधित सामग्री का बाजार 8.4 से 9.9 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है. वर्ष 2007 में यह बाजार करीब 1.8 से 2.2 करोड़ रुपये का था. यानी करीब दो दशक में इस कारोबार में चार से साढ़े चार गुना तक वृद्धि का अनुमान है.
धोती-कुर्ते से प्रिंटेड टी-शर्ट तक बदला फैशन
करीब दो दशक में शिवभक्तों के पहनावे में भी बड़ा बदलाव आया है. पहले सावन में धोती-कुर्ता और गमछा सबसे अधिक पसंद किए जाते थे. इसके बाद कुर्ता, टोपी और झोले का चलन बढ़ा. वर्ष 2011-12 के आसपास टी-शर्ट ने सावन के बाजार में अपनी जगह बनानी शुरू की. वर्ष 2014 के बाद ‘बोल बम’, ‘हर-हर महादेव’ और भगवान शिव की तस्वीर वाली प्रिंटेड टी-शर्ट युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हुई. अब ब्रांडेड शैली के टी-शर्ट सेट, फोटो प्रिंट टी-शर्ट, लोअर, साफी और मनी बैग भी युवाओं की पसंद बन चुके हैं. महंगे डिजाइन और बेहतर कपड़े वाले टी-शर्ट सेट की मांग में भी वृद्धि हुई है.
15 से 28 वर्ष के युवाओं में बढ़ा आकर्षण
बाजार के अनुमानित आंकड़ों में खरीदारों की उम्र में भी बदलाव दिखता है. वर्ष 2007 में प्रमुख खरीदारों की उम्र करीब 20 से 40 वर्ष मानी जाती थी. वर्ष 2026 में प्रमुख खरीदारों का आयु वर्ग घटकर करीब 15 से 28 वर्ष रहने का अनुमान है. कांवड़ यात्रा और धार्मिक परिधानों के प्रति युवाओं का बढ़ता आकर्षण इसका प्रमुख कारण माना जा रहा है. सोशल मीडिया और नए डिजाइन वाले धार्मिक परिधानों ने भी युवाओं की पसंद को प्रभावित किया है.
राजगीर से सरमेरा तक गूंज रहा ‘बोल बम’
सावन में नालंदा की सड़कों पर कांवड़ियों के जत्थे देखने को मिल रहे हैं. राजगीर, इस्लामपुर, एकंगरसराय, हिलसा, नगरनौसा, अस्थावां, बिंद और सरमेरा क्षेत्रों से गुजरने वाले मार्गों पर गेरुआ वस्त्र पहने शिवभक्तों की आवाजाही बढ़ गई है. सुबह से देर शाम तक कई मार्गों पर ‘बोल बम’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष सुनाई दे रहे हैं. कांवड़िये रास्ते के बाजारों से गेरुआ कपड़े, गमछा, साफी, झोला, पूजा सामग्री, खाद्य पदार्थ और अन्य जरूरी सामान खरीद रहे हैं. इससे कांवड़ मार्ग से जुड़े छोटे दुकानदारों और अस्थायी विक्रेताओं का कारोबार भी बढ़ा है.
महिलाओं और युवतियों की बढ़ी भागीदारी
पिछले करीब एक दशक में कांवड़ यात्रा का स्वरूप भी तेजी से बदला है. अब महिलाओं और लड़कियों की भागीदारी बढ़ी है. कई जगह महिला कांवड़ियों के अलग जत्थे दिखाई दे रहे हैं. गेरुआ वस्त्र पहने महिलाएं और युवतियां कंधे पर कांवड़ लेकर शिवालयों की ओर जाती नजर आती हैं. महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का असर बाजार पर भी पड़ा है. साड़ी, चुनरी, कुर्ती, टी-शर्ट, दुपट्टा, गमछा, चूड़ी, बिंदी और अन्य श्रृंगार सामग्री की मांग बढ़ी है.
70:30 से 61:39 हुआ पुरुष-महिला खरीदारों का अनुपात
अनुमानित बाजार आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2007 में सावन से जुड़ी खरीदारी में पुरुषों की हिस्सेदारी करीब 70 प्रतिशत और महिलाओं की 30 प्रतिशत थी. वर्ष 2026 में पुरुषों की हिस्सेदारी घटकर करीब 61 प्रतिशत, जबकि महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 39 प्रतिशत रहने का अनुमान है. यह बदलाव कांवड़ यात्रा में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और उनकी स्वतंत्र खरीदारी में वृद्धि का संकेत माना जा रहा है.
पुरुष कांवड़िये 450 से 650 रुपये तक कर रहे खर्च
पिछले करीब 10 वर्षों से हर सावन बाबा बैद्यनाथ धाम, देवघर जाने वाले कांवड़िये पंकज कुमार बताते हैं कि एक पुरुष कांवड़िया गेरुआ पोशाक और यात्रा की जरूरी वस्तुओं पर सामान्य तौर पर करीब 450 से 650 रुपये खर्च करता है. बोल बम टी-शर्ट की कीमत करीब 100 से 180 रुपये, लोअर 150 से 250 रुपये, गमछा 80 से 120 रुपये, झोला 20 से 50 रुपये, साफी 40 से 80 रुपये और मनी बैग 60 से 150 रुपये तक मिल जाता है. कई श्रद्धालु टी-शर्ट, लोअर और गमछे का पूरा सेट 250 से 500 रुपये में भी खरीद लेते हैं. हालांकि, वास्तविक खर्च व्यक्ति की पसंद और खरीदारी की मात्रा पर निर्भर करता है.
महिलाओं की खरीदारी 550 से 800 रुपये तक
महिला शिवभक्तों की खरीदारी में कपड़ों के साथ श्रृंगार सामग्री भी शामिल होती है. बाजार के सामान्य अनुमान के अनुसार, एक महिला श्रद्धालु सावन में करीब 550 से 800 रुपये तक खर्च कर सकती है. साड़ी या चुनरी पर 250 से 450 रुपये, चूड़ी पर 50 से 100 रुपये, बिंदी और श्रृंगार सामग्री पर 40 से 80 रुपये तथा मेहंदी पर 30 से 60 रुपये तक खर्च हो सकते हैं. कुछ महिलाएं 200 से 350 रुपये तक का कुर्ता-सलवार सेट भी खरीदती हैं.
श्रृंगार सामग्री के कारण महिलाओं का औसत खर्च अधिक
महिला श्रद्धालुओं का औसत खर्च पुरुषों की तुलना में थोड़ा अधिक रहने का अनुमान है. इसकी वजह यह है कि महिलाओं की खरीदारी केवल गेरुआ कपड़ों तक सीमित नहीं रहती. चूड़ी, बिंदी, मेहंदी और अन्य श्रृंगार सामग्री भी इसमें शामिल होती है. वहीं पुरुषों की खरीदारी मुख्य रूप से टी-शर्ट, लोअर, गमछा, साफी और झोले तक सीमित रहती है.
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कोविड काल में थम गया था सावन का बाजार
वर्ष 2020 और 2021 में कोरोना संक्रमण और कांवड़ यात्रा पर लगी पाबंदियों का सावन के बाजार पर सीधा असर पड़ा. वर्ष 2020 में कारोबार घटकर करीब 1.5 से 2 करोड़ रुपये और वर्ष 2021 में करीब 2 से 2.8 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है. वर्ष 2022 के बाद धार्मिक गतिविधियां सामान्य होने के साथ बाजार में फिर तेजी आई. अनुमानित कारोबार वर्ष 2022 में 5.8 से 6.9 करोड़ रुपये, वर्ष 2023 में 6.4 से 7.6 करोड़ रुपये, वर्ष 2024 में 7 से 8.3 करोड़ रुपये और वर्ष 2025 में 7.7 से 9.1 करोड़ रुपये रहा. वर्ष 2026 में यह कारोबार बढ़कर 8.4 से 9.9 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है.
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छोटे दुकानदारों और अस्थायी विक्रेताओं को भी मिल रहा लाभ
सावन की बढ़ती खरीदारी का लाभ केवल कपड़ा कारोबारियों को नहीं मिल रहा है. कांवड़, गमछा, साफी, झोला, मनी बैग, पूजा सामग्री, फल, पानी और खाद्य पदार्थ बेचने वाले छोटे दुकानदारों और अस्थायी विक्रेताओं को भी अतिरिक्त कारोबार मिल रहा है. बिहारशरीफ समेत प्रमुख बाजारों और शिवालयों के आसपास सावन के दौरान ऐसी दुकानों की संख्या बढ़ जाती है.
प्रति श्रद्धालु 500 से 700 रुपये की औसत खरीदारी
स्थानीय बाजार में वस्तुओं की कीमत और सामान्य खरीदारी के अनुमान को आधार मानें तो पुरुष और महिला श्रद्धालुओं को मिलाकर प्रति श्रद्धालु औसत खरीदारी करीब 500 से 700 रुपये रहने का अनुमान है. हालांकि, वास्तविक खर्च श्रद्धालु की पसंद, वस्तुओं की गुणवत्ता और खरीदारी की मात्रा के अनुसार कम या अधिक हो सकता है.
आस्था के साथ बदल रहा नालंदा का बाजार
नालंदा में सावन अब धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय कारोबार के लिए भी महत्वपूर्ण मौसम बन गया है. दो दशक में धोती-कुर्ते से लेकर ‘बोल बम’ टी-शर्ट और गेरुआ गमछे तक बाजार का स्वरूप बदला है. युवाओं और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने इस बाजार को नया ग्राहक वर्ग दिया है. राजगीर से सरमेरा और इस्लामपुर से नगरनौसा तक कांवड़ियों की बढ़ती आवाजाही का असर बाजार और सड़कों, दोनों पर दिखाई दे रहा है.
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