कभी राष्ट्रपति भवन की शोभा बढ़ाते थे नालंदा के हैंडलूम पर्दे, अब अपने ही जिले में बाजार की है तलाश

नालंदा के हैंडलूम उद्योग की हालत चिंताजनक है. कभी राष्ट्रपति भवन की शोभा बढ़ाने वाले ये उत्पाद अब स्थानीय सरकारी संस्थानों में भी अपनी जगह नहीं पा रहे हैं. जानिए कैसे सरकारी पहल से इस पारंपरिक कला को बचाया जा सकता है.

Nalanda handloom: नालंदा की पहचान केवल प्राचीन शिक्षा, संस्कृति और पर्यटन से ही नहीं, बल्कि अपने समृद्ध हस्तकरघा उद्योग से भी रही है. कभी नालंदा में निर्मित हैंडलूम के पर्दे देश के प्रतिष्ठित भवनों में शुमार राष्ट्रपति भवन के दरवाजों और खिड़कियों की शोभा बढ़ाया करते थे. यह परंपरा लंबे समय तक जारी रही. लेकिन समय के साथ सरकारी खरीद और उपयोग की व्यवस्था में बदलाव आने के बाद नालंदा के हैंडलूम उद्योग को इसका लाभ मिलना लगभग बंद हो गया.

स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्तमान समय में नालंदा में निर्मित हैंडलूम के पर्दे जिले के सरकारी कार्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, अकादमियों, अस्पतालों और न्यायालयों तक में दिखाई नहीं देते हैं. इससे स्थानीय बुनकरों और हैंडलूम कारोबारियों के सामने रोजगार और बाजार का संकट लगातार गहराता जा रहा है.

सरकारी संस्थानों में स्थानीय हैंडलूम के इस्तेमाल की मांग

जदयू के वरिष्ठ नेता एवं मुखिया प्रतिनिधि पंकज कुमार, मुखिया प्रतिनिधि वागीश भूषण, वार्ड पार्षद महेंद्र यादव, डॉ अनिल कुमार समेत अन्य लोगों ने सरकार और नालंदा जिला प्रशासन से इस दिशा में ठोस पहल करने की मांग की है.

उन्होंने कहा कि जिले के सभी विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, अकादमियों, अस्पतालों, सरकारी कार्यालयों और न्यायालयों के दरवाजों और खिड़कियों पर नालंदा निर्मित हैंडलूम के पर्दों के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट नीति निर्धारित की जानी चाहिए.

स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता मिलने से मिलेगा बाजार

स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी संस्थानों में स्थानीय उत्पादों के उपयोग को प्राथमिकता मिलने से नालंदा के बुनकरों को स्थायी बाजार मिल सकता है. इससे पारंपरिक हस्तकरघा कला को संरक्षण मिलने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं.

पूर्व प्रखंड प्रमुख सुधीर कुमार पटेल, जदयू नगर अध्यक्ष आशुतोष कुमार पांडेय और अन्य स्थानीय लोगों ने कहा कि जिस नालंदा निर्मित हैंडलूम के पर्दों ने कभी राष्ट्रपति भवन की शोभा बढ़ायी थी, उसी उद्योग को आज अपने ही जिले में बाजार की तलाश है. जिला प्रशासन यदि सरकारी संस्थानों में स्थानीय हैंडलूम उत्पादों के उपयोग की व्यवस्था लागू करता है, तो संकट से गुजर रहे हैंडलूम उद्योग को नई संजीवनी मिल सकती है.

सरकारी खरीद सुनिश्चित करने पर जोर

कांग्रेस के प्रांतीय नेता नवेन्दू झा और जदयू के जिला उपाध्यक्ष सुवेन्द्र राजवंशी ने कहा कि नालंदा के हाथों से बुने हैंडलूम के पर्दे कभी राष्ट्रपति भवन की शोभा बढ़ाते थे. सरकारी संरक्षण के अभाव में यह पारंपरिक उद्योग आज संकट में है.

उन्होंने स्थानीय उत्पादों की सरकारी खरीद सुनिश्चित कर हैंडलूम उद्योग को पुनर्जीवित करने पर जोर दिया. साथ ही सरकारी कार्यालयों, विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, अकादमियों, अस्पतालों और न्यायालयों में नालंदा निर्मित पर्दों के उपयोग को प्राथमिकता देने की मांग की.

सरकारी सहारे से लौट सकती है बुनकरों की रौनक

स्थानीय लोगों का कहना है कि नालंदा के हैंडलूम को यदि सरकारी संस्थानों के रूप में नियमित बाजार मिल जाए, तो बुनकरों और इससे जुड़े कारोबारियों के सामने रोजगार का संकट कम हो सकता है. इससे पारंपरिक हस्तकरघा कला को भी आगे बढ़ाने का अवसर मिलेगा. अब निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार और जिला प्रशासन स्थानीय हैंडलूम उत्पादों को सरकारी संस्थानों में बढ़ावा देने के लिए क्या पहल करते हैं.

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By रामविलास प्रसाद

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