शिक्षा केवल ज्ञान नहीं, बल्कि गुरु कृपा का परिणाम भी : मोरारी बापू

यहां के ऐतिहासिक पर्वत वैभारगिरी की उपत्यका में बने आरआइसीसी में आयोजित रामकथा के चौथे दिन पूज्य मोरारी बापू ने महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र की यूनिवर्सिटी का सुंदर वर्णन करते हुए शिक्षा की गहराई पर प्रकाश डाला.

राजगीर. यहां के ऐतिहासिक पर्वत वैभारगिरी की उपत्यका में बने आरआइसीसी में आयोजित रामकथा के चौथे दिन पूज्य मोरारी बापू ने महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र की यूनिवर्सिटी का सुंदर वर्णन करते हुए शिक्षा की गहराई पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि भगवान राम पहले वशिष्ठजी की गुरुकुल में गये. वहां उन्होंने ब्रह्म विद्या, योग विद्या, अध्यात्म, वेद और लोक विद्या प्राप्त की. वशिष्ठजी की शिक्षा पद्धति ऐसी थी कि गुरु को देखकर ही विद्या शिष्य में समा जाती थी. बापू ने कहा कि इसके लिए शिष्य में चार गुण आवश्यक हैं. वह है आर्त भाव, अर्थार्थिता, जिज्ञासा और सहजता। जब शिष्य इन गुणों से युक्त होते हैं, तब गुरु उसमें स्वयं को उंडेल देते हैं. लक्ष्य पाने के लिए आग्रह और जिज्ञासा तीन प्रकार की होनी चाहिए ब्रह्म जिज्ञासा, भक्ति जिज्ञासा और धर्म जिज्ञासा. जब ये सभी गुण शिष्य में होते हैं, तब द्वैत मिट जाता है और अद्वैत प्रकट होता है. भगवान राम में ये सभी भाव थे। इसलिए वशिष्ठ जी की सम्पूर्ण विद्या उनमें समा गयी. उन्होंने कहा कि इसके बाद राम विश्वामित्रजी के आश्रम में गये। वहां उन्होंने अस्त्र-शस्त्र विद्या, यज्ञ विद्या, उद्धारक विद्या और यात्रा विद्या सीखी. विश्वामित्रजी ने उन्हें व्यावहारिक जीवन की चुनौतियों से लड़ने के लिए तैयार किया. बापू ने कहा कि यदि समय पर हमें भी शस्त्रविद्या सिखाई जाती, तो आक्रमणों से बचा जा सकता था. लेकिन साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि वे स्वयं युद्ध के समर्थक नहीं हैं. उन्होंने शिक्षा को केवल ज्ञान नहीं, बल्कि गुरु कृपा का परिणाम बताया. उन्होंने शिक्षा को आत्मिक और सामाजिक रूप से संपूर्ण बनाने पर बल दिया. बापू ने यह भी कहा कि यह भाष्य नहीं, गुरु कृपा है. उसे पाने के लिए विश्वास, सहजता और निजत्व आवश्यक हैं. भारतीयों को अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान समय पर दिया गया होता, तो आक्रमणों से बचा जा सकता थ. उन्होंने स्पष्ट कहा वे स्वयं युद्ध के समर्थक नहीं हैं, पर असुरी प्रवृत्तियों के नियंत्रण और सभ्यता की रक्षा के लिए शस्त्र विद्या आवश्यक है. बापू ने ‘तक्षशिला’ का गूढ़ अर्थ बताते हुए कहा कि ‘तक्ष’ यानी तराशना और ‘शिला’ यानी पत्थर. विद्यार्थी एक पत्थर के समान होते हैं. उन्हें विश्वविद्यालय तराशता है. जो पत्थर को तराशकर जगत को आचार, विचार और संस्कार दे वही तक्षशिला है. हर व्यक्ति के भीतर परमात्मा छिपा होता है. बस उसे प्रकट करने की आवश्यकता है. प्रकाश और अंधकार पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि उजाला दोष-दर्शन कराता है, जबकि अंधकार में गुण-दोष नहीं दिखते हैं. साधना के लिए अंधेरा भी आवश्यक है. पहले बापू ने महादेव को नीलकंठ, काकभुशुंडी को शीलकंठ, याज्ञवल्क्य को विवेककंठ और तुलसीदासजी को गुरुकंठ कहा था. आज उन्होंने याज्ञवल्क्य को दिलकंठ और तुलसीदास को कीलकंठ कहा अर्थात कोकिल स्वर वाले. बापू ने कहा कि वाल्मीकि और तुलसी वास्तव में एक ही स्वर के दो रूप हैं. बापू ने सती द्वारा राम की परीक्षा, शिव समक्ष झूठ बोलना, शिव द्वारा सती का त्याग, अखंड समाधि में बैठ जाना, सती का यज्ञाग्नि-योगाग्नि में देह त्याग करना फिर हिमालय के घर जन्म, शिव विवाह के बाद कार्तिकेय का जन्म और तड़कासुर के निर्वाण तक की कथा संक्षेप में कहकर बापू ने अपनी वाणी को विराम दिया.

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Published by: Amlesh prasad

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