नव नालंदा महाविहार के जापानी विभाग की ओर से राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत जापानी विषय के स्नातक विद्यार्थियों के लिए शुक्रवार को पाठ्यपुस्तक वितरण कार्यक्रम आयोजित किया गया. क्योसान इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) सहयोग से आयोजित कार्यक्रम में कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने विद्यार्थियों के बीच पाठ्यपुस्तकों का वितरण किया.
गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री से बढ़ेगी शैक्षणिक क्षमता
महाविहार के संकाय भवन में आयोजित कार्यक्रम में कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने कहा कि गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री विद्यार्थियों की शैक्षणिक क्षमता को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. पुस्तकों का नियमित और गंभीर अध्ययन विषय की गहरी समझ विकसित करने में मदद करता है. उन्होंने विद्यार्थियों से लगन, अनुशासन और ईमानदारी के साथ अध्ययन करने का आह्वान किया.
कुलपति ने जापानी कहावत ‘सीखने का कोई राजमार्ग नहीं होता’ का उल्लेख करते हुए कहा कि ज्ञान अर्जित करने के लिए निरंतर मेहनत और प्रयास आवश्यक है. उन्होंने विद्यार्थियों को लक्ष्य निर्धारित कर नियमित अध्ययन करने और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के लिए प्रेरित किया.
जापानी भाषा की शिक्षा को मजबूत करने की पहल
कार्यक्रम की शुरुआत जापानी विभाग के अध्यक्ष प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव के स्वागत संबोधन से हुई. उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तक उपलब्ध कराना जापानी भाषा की शिक्षा को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है. इससे विद्यार्थियों को अध्ययन में सुविधा मिलेगी और भाषा सीखने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी होगी.
कार्यक्रम के दौरान जापानी विषय के स्नातक विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तकें प्रदान की गयीं. इन पुस्तकों से विद्यार्थियों को जापानी भाषा, व्याकरण और पाठ्यक्रम को व्यवस्थित ढंग से समझने में मदद मिलेगी. साथ ही जापानी भाषा एवं संस्कृति के प्रति उनकी रुचि को भी बढ़ावा मिलेगा.
सहयोग के लिए जताया आभार
इस अवसर पर महाविहार की ओर से प्रो. अशोक कुमार चावला, पूर्व सलाहकार (जापान), विदेश मंत्रालय, भारत सरकार तथा क्योसान इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के प्रति सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया गया. वक्ताओं ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक क्षेत्र के सहयोग से विद्यार्थियों को बेहतर संसाधन उपलब्ध कराए जा सकते हैं.
कार्यक्रम का समापन जापानी विभाग के अतिथि संकाय सदस्य डॉ. सुभजीत चटर्जी के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ.
