Bihar GI Tag Product: बिहार की समृद्ध कला और हस्तशिल्प परंपरा को एक बड़ी पहचान मिली है. राज्य के तीन पारंपरिक उत्पादों को भारत सरकार की ओर से भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया गया है. इससे बिहार की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिलेगी.
GI टैग पाने वाले उत्पादों में नालंदा की प्रसिद्ध बावन बूटी साड़ी-फैब्रिक, गया का पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट और भोजपुर की पारंपरिक पीढ़िया पेंटिंग शामिल हैं. इन कलाओं की अपनी अलग पहचान है और ये वर्षों से बिहार की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा रही हैं.
नाबार्ड और बिहार सरकार के प्रयास रंग लाए
इस उपलब्धि के पीछे नाबार्ड और बिहार सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. दोनों संस्थाओं के संयुक्त प्रयास से इन पारंपरिक उत्पादों का दस्तावेजीकरण और पंजीकरण कार्य पूरा किया गया. GI टैग मिलने के बाद इन उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में विशेष पहचान और कानूनी संरक्षण मिलेगा.
पद्मश्री डॉ. रजनीकांत का रहा अहम योगदान
नाबार्ड के अनुसार, GI पंजीकरण की प्रक्रिया को सफल बनाने में वाराणसी के ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन के महासचिव और पद्मश्री डॉ. रजनीकांत का विशेष योगदान रहा. उन्होंने तकनीकी मार्गदर्शन दिया और आवश्यक दस्तावेज तैयार कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसी वजह से बिहार के इन तीनों उत्पादों को GI सूची में शामिल किया जा सका.
स्थानीय कलाकारों और बुनकरों को होगा फायदा
GI टैग मिलने से सबसे बड़ा लाभ स्थानीय कारीगरों, बुनकरों और कलाकारों को होगा. अब उनके उत्पादों को वैश्विक बाजार में अलग पहचान मिलेगी. इससे उनकी आय बढ़ने की संभावना है और पारंपरिक कला से जुड़े लोगों को नए अवसर मिलेंगे.
नकली उत्पादों पर लगेगी रोक
GI टैग का एक बड़ा फायदा यह भी है कि अब इन उत्पादों के नाम पर नकली सामान बेचना आसान नहीं होगा. नालंदा की बावन बूटी, गया की पत्थरकट्टी कला और भोजपुर की पीढ़िया पेंटिंग की प्रामाणिकता सुरक्षित रहेगी. इससे असली उत्पादों की मांग बढ़ेगी और कारीगरों को उचित मूल्य मिलेगा.
पर्यटन और हस्तशिल्प उद्योग को मिलेगा बढ़ावा
विशेषज्ञों का मानना है कि इस उपलब्धि से बिहार के पर्यटन और हस्तशिल्प उद्योग को नई गति मिलेगी. साथ ही युवाओं का रुझान भी पारंपरिक कला और शिल्प की ओर बढ़ेगा. इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और बिहार की सांस्कृतिक पहचान और मजबूत होगी.
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