Bihar politic: बिहार विधानसभा चुनावों में मिली करारी शिकस्त और राज्यसभा चुनाव में विधायकों की ‘बगावत’ ने पार्टी के भीतर ऐसा भूचाल लाया है कि अब आर-पार की जंग छिड़ गई है.
एक तरफ दिल्ली दरबार की खामोशी और दूसरी तरफ पटना की सड़कों पर गुटबाजी. आखिर बिहार कांग्रेस के इस बिखराव का असली जिम्मेदार कौन है?
हार ने खोली अंदरूनी कमजोरी की परत
पिछले विधानसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन के बाद कांग्रेस उबर नहीं पाई है. राज्यसभा चुनाव में विधायकों के कथित असहयोग ने यह साफ कर दिया कि पार्टी के भीतर तालमेल की भारी कमी है. इन घटनाओं के बाद कार्यकर्ताओं के बीच निराशा का माहौल है और संगठनात्मक गतिविधियां पड़ गई हैं.
विधानसभा चुनावों में मिली करारी शिकस्त और राज्यसभा चुनाव में विधायकों की ‘बगावत’ ने पार्टी के भीतर ऐसा भूचाल लाया है कि अब आर-पार की जंग छिड़ गई है.
केंद्रीय नेतृत्व की प्राथमिकता में नहीं बिहार
बिहार कांग्रेस के नेताओं में सबसे बड़ी टीस इस बात की है कि केंद्रीय नेतृत्व के एजेंडे से बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य का नाम लगभग गायब हो चुका है. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का पूरा ध्यान पश्चिम बंगाल और असम जैसे चुनावी राज्यों पर केंद्रित है, जिसके कारण बिहार इकाई खुद को लावारिस महसूस कर रही है.
यदि आलाकमान ने समय रहते दखल नहीं दिया, तो बिहार में पार्टी का बचा-खुचा आधार भी रेत की तरह हाथ से फिसल सकता है.
संगठन की कमजोरी बनी सबसे बड़ी चुनौती
राज्यसभा चुनाव के दौरान विधायकों के कथित असहयोग ने यह साफ कर दिया है कि पार्टी के भीतर अनुशासन नाम की चीज खत्म हो चुकी है. कांग्रेस की यह दुर्दशा केवल एक हार का नतीजा नहीं है, बल्कि सालों से संगठन की अनदेखी और गुटबाजी को बढ़ावा देने का परिणाम है.
अब सवाल यह उठता है कि क्या राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे बिहार की इस जर्जर स्थिति पर ध्यान देंगे? या फिर बिहार कांग्रेस इसी तरह गुटबाजी और अनिश्चितता के दलदल में धंसती जाएगी?
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