120 साल पुरानी मढ़ौरा चीनी मिल फिर चलेगी? तमिलनाडु के निवेशकों ने किया निरीक्षण

Bihar News: दशकों से सन्नाटे में डूबी ऐतिहासिक मढ़ौरा चीनी मिल के दिन अब फिर से बहुरने वाले हैं. रविवार, 15 मार्च को तमिलनाडु के बड़े औद्योगिक घराने 'एसएनजे ग्रुप ऑफ कंपनीज' (SNJ Group) के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने मिल का दौरा किया. यह केवल एक निरीक्षण नहीं था, बल्कि बिहार सरकार की 'सात निश्चय-3' योजना के तहत राज्य में औद्योगिक क्रांति लाने की दिशा में एक ठोस कदम है.

Bihar News: बिहार के सारण जिले में स्थित वर्षों से बंद मढ़ौरा चीनी मिल को फिर से चालू कराने की दिशा में सरकार की पहल अब जमीन पर दिखाई देने लगी है. रविवार को तमिलनाडु के निवेशकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने मिल परिसर का निरीक्षण किया और वहां की आधारभूत संरचनाओं का जायजा लिया.

इस दौरान निवेशकों ने क्षेत्र के गन्ना किसानों से भी मुलाकात कर उत्पादन, बाजार और मिल से जुड़ी संभावनाओं पर चर्चा की.

निरीक्षण से जगी नई उम्मीद

मढ़ौरा चीनी मिल लंबे समय से बंद पड़ी है और धीरे-धीरे खंडहर में बदल चुकी है. ऐसे में निवेशकों का यह दौरा क्षेत्र के लोगों के लिए नई उम्मीद लेकर आया है. प्रतिनिधिमंडल ने मिल परिसर की वर्तमान स्थिति, मशीनरी और उपलब्ध संसाधनों का आकलन किया.

निवेशकों का मानना है कि अगर आधारभूत ढांचे को दोबारा विकसित किया जाए तो यहां चीनी उद्योग को फिर से गति दी जा सकती है.

सात निश्चय-3 योजना से मिला नया मौका

बिहार सरकार की सात निश्चय-3 योजना के तहत राज्य में बंद पड़ी चीनी मिलों को फिर से चालू करने की दिशा में काम किया जा रहा है. इसके साथ ही सरकार ने राज्य में 25 नई चीनी मिलें स्थापित करने की भी योजना बनाई है.

इसी पहल के तहत तमिलनाडु के एसएनजे ग्रुप ऑफ कंपनीज के निवेशकों ने मढ़ौरा चीनी मिल में संभावनाओं का आकलन करने के लिए यह दौरा किया.

किसानों से सीधी बातचीत

निरीक्षण के दौरान निवेशकों ने क्षेत्र के गन्ना किसानों से भी मुलाकात की. किसानों ने गन्ना उत्पादन से जुड़ी समस्याओं, लागत और बाजार की स्थिति के बारे में जानकारी दी. निवेशकों ने खेतों में जाकर गन्ना फसल की स्थिति भी देखी और यह समझने की कोशिश की कि यदि मिल दोबारा शुरू होती है तो कच्चे माल की आपूर्ति किस स्तर तक संभव होगी.

ऐतिहासिक है मढ़ौरा चीनी मिल

सारण जिले की मढ़ौरा चीनी मिल का इतिहास काफी पुराना है. इसकी स्थापना 1904 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी और यह बिहार की शुरुआती चीनी मिलों में से एक मानी जाती है.

अब राज्य सरकार की पहल और निजी निवेशकों की दिलचस्पी से इसके फिर से चालू होने की उम्मीद एक बार फिर जगी है.

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लेखक के बारे में

By Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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