Bihar Education System: बिहार की शिक्षा व्यवस्था को लेकर UDISE 2025-26 रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े बताते हैं कि बिहार में सरकारी स्कूलों की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन बड़ी संख्या में स्कूल आज भी बुनियादी सुविधाओं से जूझ रहे हैं और स्कूल से बच्चे काफी संख्या में ड्रॉपआउट कर रहे हैं. पहले की तुलना में स्कूलों में इंफ्रास्ट्रक्चर कुछ हद तक सही हुआ, लेकिन अभी भी कई स्कूलों के अपने भवन नहीं हैं.
शिक्षकों की संख्या कुछ स्कूलों में सही है लेकिन कई ऐसे हैं जहां अभी भी कमी है. स्थिति ऐसी है कि एक शिक्षक के भरोसे सैकड़ों बच्चे हैं. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि माध्यमिक स्तर तक पहुंचने वाले बच्चों में सिर्फ 38.5 प्रतिशत ही 12वीं तक पहुंच पाते हैं. काफी संख्या में बच्चे ड्रॉपआउट कर रहे हैं. ऐसे में सवाल है कि आखिर स्कूल तक बच्चों के नहीं पहुंचने और ड्रॉपआउट करने की वजह क्या हो सकती है?
आंकड़े क्या कहते हैं?
सबसे पहले UDISE 2025-26 के आंकड़ों पर नजर डालते हैं. एक तरफ बिहार में सरकारी स्कूलों की संख्या बढ़कर 66,915 हो गई है. पिछले साल यह संख्या 66,803 थी. यानी स्कूलों की संख्या में मामूली बढ़ोतरी हुई. लेकिन दूसरी तरफ स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं, शिक्षकों और बच्चों के स्कूल में टिके रहने को लेकर बड़ी चुनौतियां सामने आती हैं.
- करीब 3 हजार स्कूलों के पास अपना भवन नहीं
बिहार के 35 जिलों में करीब 2,996 सरकारी स्कूल बिना अपने भवन के चल रहे हैं. इनमें प्राथमिक, मध्य और उच्च माध्यमिक स्कूल शामिल हैं. ऐसे में सवाल यह है कि जिस स्कूल के पास अपना भवन तक नहीं है, वहां बच्चों को बेहतर और सुरक्षित शैक्षणिक माहौल कैसे मिलेगा?
- 2,006 स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक
शिक्षक उपलब्धता की तस्वीर भी परेशान करने वाली है. बिहार में 2,006 ऐसे सरकारी स्कूल हैं, जहां केवल एक शिक्षक तैनात है. इन स्कूलों में 1.62 लाख से ज्यादा बच्चे नामांकित हैं. यानी औसतन एक शिक्षक पर करीब 81 बच्चे. पूरे राज्य का छात्र-शिक्षक अनुपात भी राष्ट्रीय औसत से खराब है. बिहार में यह 28 है, जबकि देश का औसत 24 है. माध्यमिक स्तर पर स्थिति और गंभीर है, यहां बिहार का अनुपात 32, जबकि राष्ट्रीय औसत सिर्फ 21 है.
- असली चिंता-बच्चे स्कूल छोड़ कहां रहे हैं?
बिहार की शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती शायद स्कूलों की संख्या नहीं, बल्कि बच्चों को स्कूल में बनाए रखना है. क्लास 3 से 5 के बीच बिहार में पढ़ाई छोड़ने की दर 7.9% है. राष्ट्रीय औसत सिर्फ 1.8% है. यानी शुरुआती कक्षाओं में ही बिहार में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों का अनुपात देश के औसत से कई गुना ज्यादा है.
- क्लास 8 के बाद हर चौथा बच्चा आगे नहीं बढ़ता
सबसे बड़ा झटका क्लास 8 के बाद दिखाई देता है. बिहार में क्लास 8 से 9 में जाने की दर सिर्फ 74.1% है, जबकि राष्ट्रीय औसत 88.3% है. आसान भाषा में समझें तो हर चौथा बच्चा 8वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देता है.
- 12वीं तक पहुंचते-पहुंचते कितने बच्चे बचते हैं?
माध्यमिक स्तर पर स्थिति और गंभीर हो जाती है. आंकड़ों के मुताबिक बिहार में केवल 38.5% बच्चे ही 12वीं क्लास तक पहुंच पाते हैं. यानी स्कूल में दाखिला लेने वाले बच्चों की बड़ी संख्या धीरे-धीरे शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो जाती है.
- नामांकन भी राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे
माध्यमिक स्तर पर बिहार का GER यानी सकल नामांकन अनुपात 47.6% है, जबकि राष्ट्रीय औसत 71.7% है. प्री-प्राइमरी स्तर पर भी बिहार का GER 24.1% है, जबकि देश का औसत 42.8% है.
- स्कूल हैं, लेकिन सुविधाएं कितनी?
बिहार के सिर्फ 47.9% सरकारी स्कूलों में खेल का मैदान है. 22.4% स्कूलों में किचन गार्डन, 10.2% में सोलर पैनल और महज 3.6% स्कूलों में डिजिटल लाइब्रेरी उपलब्ध है. यानी डिजिटल शिक्षा और आधुनिक स्कूलिंग की बात करने से पहले बड़ी संख्या में स्कूलों को बुनियादी सुविधाओं से जोड़ना अभी बाकी है.
आखिर इन आंकड़ों का मतलब क्या है?
आंकड़ों से साफ है कि बिहार में स्कूलों की संख्या बढ़ना अच्छी खबर है, लेकिन सिर्फ स्कूल बढ़ने से शिक्षा मजबूत नहीं होगी. हर स्कूल में पर्याप्त शिक्षक, हर बच्चे के लिए बेहतर बुनियादी सुविधाएं और बच्चों को स्कूल में बनाए रखने की ठोस रणनीति की जरूरत महसूस की जा रही है. क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि बिहार में कितने स्कूल हैं. असली सवाल है कि इन स्कूलों में नामांकन लेने वाले कितने बच्चे 12वीं तक पहुंच पा रहे हैं? और UDISE+ के ये आंकड़े बताते हैं कि इस सवाल का जवाब अभी बिहार के लिए चिंता का विषय है.
बच्चों के स्कूल छोड़ने पर क्या कहना है जानकारों का?
पूर्व आईएएस अधिकारी और बिहार विद्यापीठ के अध्यक्ष विजय प्रकाश का कहना है कि जिस तरह से स्कूलों में बच्चों को नियमित तरीके से मिड डे मील, साइकिल, कपड़े और किताब उपलब्ध कराए जा रहे हैं, ठीक वैसे ही पढ़ाई पर भी फोकस करने की जरूरत है. ऐसा नहीं होने से बच्चे स्कूल छोड़ रहे. ऐसे में नॉन-एकेडमिक चीजों पर भी ध्यान दिया जा सकता है. रोचक तरीके से बच्चों के स्कूल जाने के लिए प्ररित किए जाने की जरूरत है.
आगे उन्होंने यह भी बताया कि शैक्षणिक आवश्यकता के अनुसार स्कूलों में व्यवस्था नहीं की गई. स्कूलों में अगर रीजनल लैंग्वेज यानी कि बच्चों की जो अपनी भाषा है उसी में पढ़ाई (जैसे कि- भोजपुरी, मैथिली, मगही या अन्य) में की जाए तो बच्चे स्कूल में टिके रह सकते हैं. इसके साथ ही स्कूलों में गांव के खेलों को भी शामिल किए जाने की जरूरत है.
उनका यह भी कहना है कि कई स्कूलों में लैब की स्थिति सही नहीं है. कुछ स्कूलों में कंप्यटर लैब नहीं है और जहां हैं वहां बच्चों को पढ़ाया नहीं जा रहा है. लैब में कंप्यूटर ऐसे ही पड़े हैं. इस तरह से पढ़ाई पर फोकस और कई तरह के खेल प्रतियोगिताओं के आयोजन करने से भी बच्चों के ड्रॉपआउट को काफी हद तक रोका जा सकता है.
इसी तरह से एएन सिन्हा इंस्टीच्यूट के पूर्व निदेशक डीम दिवाकर ने सरकारी स्कूलों में बच्चों के नहीं पहुंचने की कई वजहें बताईं. उनका कहना है कि स्कूलों में शिक्षकों की कमी, जो शिक्षक हैं उनमें प्रशिक्षण का अभाव, अरुचिकर पाठ्यक्रम, शिक्षकों को कई अन्य काम में शामिल करना, बीईओ और डीईओ की उदासीनता और उनमें पारदर्शिता की कमी, संवेदनशील प्रशासन का अभाव, तकनीकी प्रशासन पर अधिक जोर, सरकारी सेवक और शिक्षक के बच्चों का प्राइवेट स्कूलों में नामांकन, साईकिल पोशाक, पुस्तक प्रकाशन और वितरण में व्याप्त भ्रष्टाचार, अकुशल शिक्षकों की नियुक्ति, निष्ठावान शिक्षकों पर भरोसा की कमी, नौकरशाही का प्रभुत्व समेत कई कारण हो सकते हैं, जिसकी वजह से सरकारी स्कूलों की यह स्थिति है.
सरकारी स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम अब भी सपना
बिहार के केवल 8,892 स्कूलों यानी करीब 11.6% स्कूलों में ही स्मार्ट बोर्ड उपलब्ध हैं. यानी करीब 88% स्कूल अभी भी स्मार्ट बोर्ड की सुविधा से बाहर हैं. लेकिन बिहार के सरकारी स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम और तकनीक आधारित शिक्षा को लेकर सरकार लगातार जोर दे रही है. शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी के मुताबिक, डिजिटल बोर्ड, ई-कंटेंट और ऑनलाइन मॉड्यूल के बाद अब AI आधारित लाइव स्मार्ट क्लास की भी शुरुआत की गई है. धीरे-धीरे राज्य के ज्यादातर सरकारी स्कूलों में मॉडर्न सुविधाएं होंगी.
मिथिलेश तिवारी ने की थी 7900 करोड़ के विशेष पैकेज की मांग
बिहार में शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने केंद्र से मदद मांगी थी. शिक्षा मंत्री ने केंद्र से 7,900 करोड़ रुपये के विशेष शिक्षा पैकेज की मांग की थी. जानकारी के मुताबिक, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के प्रभावी इंप्लीटेशन और बिहार की बढ़ती शैक्षणिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए यह मांग की गई.
नई दिल्ली के आईसीएआर सभागार में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की अध्यक्षता में दो दिवसीय प्रगति समीक्षा बैठक हुई थी. बैठक में शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने मांग रखते हुए कहा था कि बिहार में शिक्षा व्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए केंद्र के विशेष सहयोग की आवश्यकता है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लक्ष्यों को समय से हासिल करने के लिए आधारभूत संरचना, डिजिटल शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण और संस्कृत शिक्षा के क्षेत्र में बड़े निवेश की जरुरत है.
आगे उन्होंने माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक विद्यालयों के भवनों, अतिरिक्त कक्षाओं, कंप्यूटर प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों आदि के विकास के लिए 3000 करोड़ रुपये की विशेष केंद्रीय सहायता मांगी थी. आकांक्षी जिलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, स्मार्ट क्लास आदि को मजबूत करने के लिए 2000 करोड़ रुपये का अनुरोध किया था. डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए 1000 करोड़ रुपये की सहायता की मांग और संस्कृत शिक्षा के सुदृढ़ीकरण पर भी बिहार सरकार ने विशेष जोर दिया था.
सीएम सम्राट चौधरी ने क्या-क्या किए ऐलान?
- राज्य स्तरीय समिति का गठन
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को हर स्कूल तक पहुंचाने के लिए राज्य स्तरीय समिति का गठन किया गया है, ताकि हर एक स्कूल को उत्कृष्टता का केंद्र बनाया जा सके और छात्रों के सीखने के स्तर में निरंतर सुधार सुनिश्चित हो.
- परीक्षा व्यवस्था में सुधार और AI की होगी एंट्री
सरकार परीक्षा प्रणाली में भी बड़े बदलाव की तैयारी की है. परीक्षाओं को पारदर्शी, निष्पक्ष और आधुनिक बनाने के लिए राज्य स्तरीय परीक्षा सुधार समिति गठित की जाएगी. यह समिति बोर्ड और प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ-साथ कक्षा स्तर पर होने वाले मूल्यांकन की भी समीक्षा करेगी. छात्रों ने कितना याद किया, सिर्फ इतना ही नहीं देखा जाएगा. बल्कि उनकी समझ, विश्लेषण क्षमता और विषय पर पकड़ का भी आकलन किया जाएगा. इसके लिए तकनीक और AI का इस्तेमाल करने के सुझाव दिए जाएंगे.
- छात्रों की समस्याओं के लिए बनेगा अलग पोर्टल
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने छात्रों के लिए अलग ऑनलाइन पोर्टल बनाने की घोषणा की है. इस पोर्टल पर विद्यार्थी स्कूल, कॉलेज, परीक्षा, शिक्षा व्यवस्था और प्रशासन से जुड़ी अपनी समस्याएं दर्ज कर सकेंगे. छात्र अपने सुझाव भी सीधे सरकार तक पहुंचा सकेंगे. खास बात यह होगी कि शिकायत सिर्फ दर्ज करके छोड़ नहीं दी जाएगी. उसके समाधान की निगरानी भी की जाएगी.
- शिक्षा के साथ कौशल और रोजगार पर भी जोर
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा था कि बिहार के युवाओं को शिक्षा, कौशल और अवसरों से जोड़ना सरकार की प्राथमिकता है. सरकार का लक्ष्य ऐसी आधुनिक शिक्षा व्यवस्था तैयार करना है, जिससे बिहार के बच्चों को बेहतर पढ़ाई के लिए दूसरे राज्यों का रुख न करना पड़े. इसके लिए राज्य में 1001 मॉडल स्कूल विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है. सरकार का कहना है कि इन स्कूलों के जरिए बच्चों को बेहतर शैक्षणिक माहौल देने की कोशिश की जाएगी.
- सीनियर ऑफिसर-मिनिस्टर करेंगे छात्रों से बात
शिक्षा सुधार के लिए विशेष सहयोग शिविर आयोजित किए जाएंगे, जिनमें मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक और छात्रों के साथ संवाद कर उनके सुझाव एवं समस्याएं सुनी जाएंगी. इस फैसले से यह माना जा रहा है कि छात्रों या शिक्षकों को अपनी शिकायत के लिए भटकना नहीं पड़ेगा. बातचीत के दौरान वे अपनी समस्याएं रख सकते हैं, जिसका जल्द ही समाधान भी कर दिया जाएगा.
- छात्र कल्याण निदेशालय
सीएम सम्राट चौधरी के मुताबिक, छात्रों के कल्याण से जुड़े कार्यों के बेहतर समन्वय और प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सभी संबंधित विभागों में निदेशालय का गठन किया जाएगा. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर परीक्षा व्यवस्था और छात्रों के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण के लिए बिहार सरकार प्रतिबद्ध है.
- रात के 11 बजे भी नहीं रुकेगी बच्चों की पढ़ाई
सीएम सम्राट ने कहा था, राज्य में बिहार स्कूल लाइव क्लासेस की शुरुआत की गई है. इसी व्यवस्था को अब और आगे बढ़ाया जाएगा. उन्होंने कहा कि 15 अगस्त से रात 11 बजे तक भी बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाने की प्रक्रिया शुरू होगी. यानी किसी छात्र को रात में पढ़ाई से जुड़ी कोई परेशानी है या वह किसी विषय को समझना चाहता है, तो ऑनलाइन शिक्षक से मदद ले सकेगा. सरकार का फोकस सरकारी स्कूलों के बच्चों को पढ़ाई के लिए ज्यादा से ज्यादा डिजिटल सुविधाएं देने पर है.
- मुफ्त जेईई और नीट की कोचिंग
बिहार के छात्रों के लिए एक और खास ऐलान यह भी किय गया है कि पटना में स्थित 10 मॉडल स्कूलों में छात्रों को जेईई और नीट की मुफ्त कोचिंग दी जाएगी. साथ ही बिहार स्कूल लाइव क्लासेस कार्यक्रम की शुरुआत की गई है. इसे राज्य के लगभग 155 स्कूलों तक विस्तारित किए जाने की योजना है.
सरकार के सामने ये है चुनौती
बिहार सरकार की तरफ से छात्रों और युवाओं के लिए कई जरूरी योजनाओं के ऐलान किए गए हैं. इसमें स्मार्ट क्लासरूम से लेकर एआई ट्रेनिंग तक शामिल है. लेकिन ये सभी योजनाएं धरातल पर उतारना ही सरकार की बड़ी चुनौती मानी जा रही है. जानकारों का मानना है कि जिस तरह से सरकार बिहार की शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने की प्लानिंग कर रही है, अगर उसे सही तरीक से इंप्लीमेंट किया जाए तो काफी हज तक शिक्षा व्यवस्था में सुधार की उम्मीद है. दूसरी तरफ UDISE के आंकड़ों को भी इग्नोर नहीं किया जा सकता है. आंकड़ों से साफ है कि बच्चे शुरुआत में स्कूली शिक्षा ही सही तरीके से नहीं ले पा रहे हैं. खासकर बच्चों का ड्रॉपआउट करना बड़ा चिंता का विषय माना जा रहा है. ऐसे में बिहार सरकार अपनी योजनाओं के जरिए किस हद तक बच्चों को स्कूल जाने के लिए मोटिवेट और शिक्षा में सुधार कर पाती है, यह देखने वाली बात होगी.
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