अपनी मर्यादा से हट कर जीना पाप : जीयर स्वामी

आरा : मर्यादा से अलग हट कर जीना पाप है. हर श्रेणी के व्यक्तियों के अलग-अलग धर्म और मर्यादाएं हैं, जिनका सम्यक पालन करते हुए जीवनयापन करना ही धर्म है. व्यक्ति को कभी भी अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए. उपरोक्त बातें श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी ने चंदवा चातुर्मास ज्ञान यज्ञ के क्रम […]

आरा : मर्यादा से अलग हट कर जीना पाप है. हर श्रेणी के व्यक्तियों के अलग-अलग धर्म और मर्यादाएं हैं, जिनका सम्यक पालन करते हुए जीवनयापन करना ही धर्म है. व्यक्ति को कभी भी अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए. उपरोक्त बातें श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी ने चंदवा चातुर्मास ज्ञान यज्ञ के क्रम में प्रवचन करते हुए कहीं. श्री जीयर स्वामी ने कहा कि धर्म का अपना अलग-अलग स्वरूप होता और वह उसी दायरे में सुशोभित होता है. मानव धर्म, स्त्री धर्म, ब्राह्मण धर्म, ब्रह्मचारी धर्म, संन्यासी धर्म, कृषक और विद्यार्थी धर्म आदि के लिए पहली अर्हता सत्य बोलना है. साथ ही दया, सदाचार, परोपकार एवं सरलता की भावना के साथ जीवन यापन करना है.

उन्होंने कहा कि संत और ईश्वर श्रद्धा के विषय हैं. संत-महात्मा से जानने की कोशिश करें. हारने-हराने के निमित्त प्रश्न नहीं करना चाहिए, क्योंकि संत, शास्त्र और परमात्मा परीक्षा के विषय नहीं होते. उन्होंने प्रसंगवश भरत चरित्र की चर्चा करते हुए कहा कि लोगों को भरत चरित्र श्रवण करने में आनंद आता है, लेकिन भाई से मामूली विवाद पर झगड़ जाना और मरने-मारने पर तूल कर न्यायालय तक पहुंचा देने से परहेज नहीं करते. जीवन में अगर सुख-शांति की कामना है, तो संतुष्टि, सद्भाव और समर्पण को अपनाना होगा. अन्यथा घन लोलुपता, स्वार्थ और द्वेष जीवन को तबाह कर देता है. भगवान का सबसे प्रिय वही है, जो परोपकारी होता है पृथ्वी परोपकारों में सर्वोपरि है. पृथ्वी को सुबह प्रणाम कर पैर रखना चाहिए. जो दृश्यमान संसार का भार वहन करते हुए सभी जीवों की भोजन और आश्रय की भी व्यवस्था करती है.

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