गंगा पार गोपालपुर विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत बसा उजानी गांव लोक आस्था, इतिहास और पौराणिक परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है. लोक मान्यताओं और जनश्रुतियों के अनुसार, यही उजानी गांव सती बिहुला की जन्मस्थली (मायका) है. सदियों पुरानी प्रसिद्ध बिहुला-विषहरी लोकगाथा और अंग प्रदेश की मंजूषा कला का यह प्रमुख केंद्र आज प्रशासनिक उपेक्षा के कारण अपनी पहचान खोने की कगार पर है.
सती बिहुला और मंजूषा कला का पौराणिक इतिहास
मान्यता है कि भगवान शिव की मानस पुत्री मां मनसा (विषहरी) को पृथ्वी लोक पर पूजा का अधिकार दिलाने के लिए सती बिहुला ने उजानी गांव में जन्म लिया था:
- लखिंदर से विवाह व त्रासदी: सती बिहुला का विवाह चंपानगर के प्रसिद्ध व्यवसायी चंद्र सौदागर के पुत्र बाला लखिंदर से हुआ था. विवाह की सुहागरात को ही कालनागिनी के डसने से लखिंदर की मृत्यु हो गई.
- अतुलनीय सतित्व व तपस्या: बिहुला अपने पति के पार्थिव शरीर को केले के थंभ (गाछ) से बनी मंजूषा (नाव) पर रखकर चंपा नदी के रास्ते देवलोक (स्वर्गलोक) की कठिन यात्रा पर निकल पड़ीं. उनकी अटूट तपस्या से प्रसन्न होकर देवताओं ने लखिंदर को पुनर्जीवन दिया.
- मंजूषा कला की नींव: यही पौराणिक घटना आज भी बिहार, झारखंड और बंगाल में लोकगीतों व प्रसिद्ध मंजूषा चित्रकला के माध्यम से जीवंत है.
उजानी में मौजूद हैं 7 ऐतिहासिक पोखर, संरक्षण की दरकार
गांव में आज भी सती बिहुला की स्मृतियों और उनके कालखंड से जुड़े सात ऐतिहासिक पोखर मौजूद हैं. हालांकि समय के साथ उचित रखरखाव न होने से ये जलस्रोत और धरोहरें जर्जर अवस्था में पहुंच गई हैं:
विमल पोद्दार (सती बिहुला के उपासक व ग्रामीण): "वर्षों से हम ग्रामीण इन सात ऐतिहासिक पोखरों के जीर्णोद्धार, सौंदर्यीकरण और उजानी को राजकीय पर्यटन स्थल घोषित करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई."
धार्मिक पर्यटन से संवर सकती है क्षेत्र की तकदीर
स्थानीय निवासियों का कहना है कि यदि राज्य सरकार और पर्यटन विभाग उजानी गांव को धार्मिक व सांस्कृतिक कॉरिडोर से जोड़े, तो इसे बिहार के प्रमुख पर्यटन मानचित्र पर अलग पहचान मिल सकती है. इससे न केवल लोक संस्कृति का संरक्षण होगा, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे.
