भागलपुर जिले के नवगछिया (गोपालपुर) क्षेत्र में गंगा किनारे बसा 'तीनटंगा' महज एक गांव नहीं, बल्कि अपने भीतर सदियों का गौरवशाली इतिहास समेटे हुए है. आजादी से पहले तीनटंगा एक बेहद महत्वपूर्ण जमींदारी हुआ करती थी. यहीं के चर्चित जमींदार और स्वतंत्रता सेनानी महेश्वरी प्रसाद यादव ने अंग्रेजी हुकूमत के जुल्मों के खिलाफ जो विद्रोह किया था, वह आज भी क्षेत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है.
मुगलों से सनद पाकर त्रिभुवन दास ने बसाया था तीनटंगा
स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इस इलाके का इतिहास मुगल काल से जुड़ा है:
- गांव की नींव: समस्तीपुर के धमौन से भागलपुर पहुंचे त्रिभुवन दास ने गंगा किनारे के जंगलों को साफ कर तीनटंगा गांव बसाया था.
- सनद प्राप्ति: उन्होंने तत्कालीन मुगल शासन से सनद (अधिकार पत्र) प्राप्त कर चौसा, काझा और धर्मपुर सहित आसपास के क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित किया.
- जमींदारी का विस्तार: वर्ष 1785 में नवाब इब्राहिम खान से सनद प्राप्त कर त्रिभुवन दास ने तीनटंगा और पूरे गोपालपुर परगना पर अपना वर्चस्व घोषित किया. बाद में उनके वंशज निहालचंद दास, लालचंद दास (लूचाई बाबू) और फूलचंद दास (फूचाई बाबू) का इस इलाके पर गहरा प्रभाव रहा.
अंग्रेजी शासन में जमींदारी बचाने की कानूनी लड़ाई
ब्रिटिश हुकूमत के दौर में इस क्षेत्र की जमींदारी को लेकर गहरा विवाद पैदा हो गया था:
- नवाब से टकराव: अंग्रेजों ने यह क्षेत्र नवाब अब्दुल वहाब खान को सौंप दिया, लेकिन यहां के जमींदार गोप संतलाल दास ने अपनी जमींदारी का अधिकार छोड़ने से साफ इनकार कर दिया.
- अदालत में जीत: संतलाल दास ने नवाब अब्दुल वहाब खान के खिलाफ सीधे अंग्रेजी अदालत में मुकदमा दायर किया और जीत हासिल कर अपने अधिकारों को कायम रखा.
महेश्वरी प्रसाद यादव का विद्रोह और एस्टेट की जब्ती
जैसे-जैसे अंग्रेजी हुकूमत का आम लोगों पर अत्याचार और जमींदारों पर कर (Tax) का बोझ बढ़ता गया, स्थानीय स्तर पर असंतोष पनपने लगा:
- बगावत का बिगुल: इसी पृष्ठभूमि में गोप संतलाल दास के पुत्र गोप महेश्वरी दास (महेश्वरी प्रसाद यादव) ने अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया.
- खासमहल घोषित: इस बगावत से बौखलाई अंग्रेजी सरकार ने कार्रवाई करते हुए 'तीनटंगा एस्टेट' को जब्त कर लिया और उसे 'खासमहल क्षेत्र' घोषित कर दिया.
- जमींदारी का अंत: भारी दमन के बावजूद संतलाल गोप और उनका परिवार चौसा, काझा, धर्मपुर और तीनटंगा क्षेत्र से जुड़ा रहा और भूमि सुधार कानून लागू होने तक उनका यह जमींदारी संबंध बना रहा.
इतिहास के संरक्षण और व्यवस्थित अध्ययन की दरकार
महेश्वरी प्रसाद यादव का संघर्ष नवगछिया और भागलपुर क्षेत्र में स्वतंत्रता चेतना की उस नींव को दर्शाता है, जिसने बाद में 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' को ऊर्जा दी. आज इस बात की सख्त जरूरत है कि तीनटंगा एस्टेट, महेश्वरी प्रसाद यादव और उनके परिवार से जुड़े 1785 के सनद, मुकदमों, जमींदारी जब्ती के दस्तावेजों और सरकारी अभिलेखों को जिला अभिलेखागार (District Archives) से प्रमाणित कर उनका व्यवस्थित अध्ययन किया जाए. दस्तावेजों के संरक्षण से ही नवगछिया-गोपालपुर के स्थानीय प्रतिरोध की कई और अनकही कड़ियां नई पीढ़ी के सामने आ सकेंगी.
