रेलवे लाइन पर मंडराया कटाव का खतरा, 25-30 साल पहले गंगा ने छीना था घर : दूसरी बार उजड़ रहा शंकरपुर-राघोपुर

गोपालपुर में गंगा नदी का कटाव अब रेलवे लाइन के करीब पहुंच गया है, जिससे शंकरपुर-राघोपुर के सैकड़ों परिवारों पर विस्थापन का संकट मंडरा रहा है. करीब 25-30 साल पहले भी गंगा के कटाव से घर गंवा चुके ये परिवार एक बार फिर बेघर होने की कगार पर हैं. जिला प्रशासन ने लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी है, लेकिन इन परिवारों के सामने स्थायी ठिकाने का कोई समाधान नहीं है.

गोपालपुर : गंगा का कटाव अब खेत और जमीन तक सीमित नहीं रहा है. शंकरपुर-राघोपुर रेलवे लाइन के आसपास कटाव का खतरा बढ़ने के बाद वर्षों से बसे परिवारों पर एक बार फिर विस्थापन का संकट मंडरा रहा है. जिला प्रशासन की ओर से आसपास रह रहे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह के बाद परिवार अपने घर और सामान समेटकर दूसरी जगह जाने को मजबूर हैं.

विडंबना यह है कि इनमें से कई परिवार 25-30 वर्ष पहले भी गंगा के कटाव से विस्थापित हो चुके हैं. अपना मूल घर-बार गंवाने के बाद रेलवे लाइन के आसपास किसी तरह आशियाना बनाकर उन्होंने जिंदगी को फिर पटरी पर लाने की कोशिश की थी. अब उसी ठिकाने पर भी कटाव का खतरा मंडरा रहा है.

सामान समेटते रहे लोग, कई ने खुद तोड़े घर

कटाव का खतरा बढ़ने के बाद सुबह से ही परिवार अपने घरों से सामान निकालकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में जुटे रहे. कोई खाट-बिछावन और जरूरी सामान सिर पर उठाकर ले जा रहा था, तो कोई ठेला और अन्य साधनों से सामान पहुंचा रहा था.

कई परिवारों ने अपने हाथों से ही घर तोड़ना शुरू कर दिया, ताकि कम से कम बचा हुआ सामान सुरक्षित निकाला जा सके. वर्षों की मेहनत से खड़ा किया गया आशियाना अपनी आंखों के सामने टूटते देखना परिवारों के लिए बेहद पीड़ादायक है.

‘पहले भी गंगा घर ले गयी, अब फिर छोड़ना पड़ रहा’

विस्थापित शंकर मंडल, गोरेलाल मंडल और नारायण मंडल जैसे लोगों की आंखों में बेबसी साफ नजर आ रही है. उनका कहना है कि एक बार फिर समझ नहीं आ रहा कि परिवार और सामान लेकर कहां जाएं.

इन परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल स्थायी ठिकाने का है. कुछ लोग रिश्तेदारों के यहां बच्चों को पहुंचा रहे हैं, जबकि कई परिवार सड़क किनारे खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं.

घर टूट रहे, साथ बिखर रही हैं यादें

लोगों के लिए यह सिर्फ ईंट-मिट्टी का घर नहीं है. इन्हीं घरों में बच्चों ने बचपन बिताया, परिवार ने सुख-दुख देखा और वर्षों पहले हुए विस्थापन के बाद नयी जिंदगी शुरू की थी.

ग्रामीणों का कहना है कि पहली बार गंगा ने उन्हें उजाड़ा था, लेकिन इस बार रेलवे लाइन पर खतरा बढ़ने के कारण वे अपने ही हाथों से घर तोड़कर दूसरी जगह जाने को मजबूर हैं. नदी की धार के सामने उनकी मजबूरी ऐसी है कि घर बचाने से ज्यादा जरूरी अब सामान और परिवार को सुरक्षित रखना हो गया है.

राहत शिविरों में भोजन, लेकिन स्थायी ठिकाने की चिंता

जिला प्रशासन की ओर से क्षेत्र में चार-पांच राहत शिविर चलाये जा रहे हैं. इन शिविरों में बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए भोजन और नाश्ते की व्यवस्था की गयी है. बच्चों को दूध भी दिया जा रहा है.

राहत शिविरों से तत्काल सहारा जरूर मिला है, लेकिन विस्थापित परिवारों की चिंता इससे खत्म नहीं हुई है. लोगों का सवाल है कि कुछ दिन बाद वे कहां रहेंगे और बच्चों के साथ दोबारा जिंदगी की शुरुआत कैसे करेंगे.

एक जिंदगी, दो बार विस्थापन का दर्द

शंकरपुर-राघोपुर के इन परिवारों की कहानी विस्थापन की ऐसी त्रासदी है, जिसमें लोगों को एक ही जिंदगी में दो बार अपना घर छोड़ना पड़ रहा है. करीब तीन दशक पहले गंगा के कटाव ने उनका पहला आशियाना छीना था. अब उसी नदी के बढ़ते कटाव ने उनका दूसरा ठिकाना भी खतरे में डाल दिया है.

आज इन परिवारों के सामने घर बचाने का नहीं, बल्कि अपने परिवार और बची हुई जिंदगी को सुरक्षित बचाने का संघर्ष है.

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By Vipin Thakur

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