भागलपुर से अतुल तिवारी की रिपोर्ट
बढ़ते प्रदूषण, घटते वन क्षेत्र और तेजी से बदलते जलवायु चक्र के बीच पर्यावरण संरक्षण आज पूरी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने के लिए जल, जमीन, जंगल और जंगली जानवरों का संरक्षण बेहद जरूरी है. पर्यावरण में मौजूद प्रत्येक जीव-जंतु और पेड़-पौधे की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका होती है तथा सभी जीव आहार श्रृंखला के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं. किसी एक प्रजाति के समाप्त होने से प्राकृतिक संतुलन प्रभावित होता है.इसे लेकर पर्यावरणविद एवं जंतु विज्ञान के प्रोफेसर डॉ डीएन चौधरी ने कहा कि अनियंत्रित प्रदूषण, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के कारण पर्यावरण गंभीर संकट का सामना कर रहा है. नदियां सूख रही हैं, भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास सिमटते जा रहे हैं. कई जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं. इसके कारण जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और असामान्य मौसम जैसी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं.
बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण की जरूरतप्रोफेसर डॉ डीएन चौधरी ने कहा कि किसी भी क्षेत्र में कम से कम 33 प्रतिशत वन क्षेत्र होना चाहिए, जबकि बिहार में यह लगभग 16 से 17 प्रतिशत और देश में करीब 25 से 26 प्रतिशत है. वन क्षेत्र की यह कमी पर्यावरणीय असंतुलन का प्रमुख कारण बन रही है. ऐसे में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और हरित क्षेत्रों के संरक्षण की आवश्यकता है. कहा कि भागलपुर में भी बढ़ते प्रदूषण, कूड़े के अंबार और पुराने वृक्षों की उपेक्षा चिंता का विषय है. शहर के प्रमुख हरित क्षेत्र लगातार दबाव में हैं. यदि समय रहते इनके संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में पर्यावरण संबंधी समस्याएं और गंभीर हो सकती है.उन्होंने विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर लोगों से अपील की है कि पौधारोपण को जनआंदोलन बनाया जाए, बुके की जगह पौधे भेंट किए जाएं तथा स्कूलों और कॉलेजों में पर्यावरण जागरूकता अभियान चलाया जाए. प्रकृति के संरक्षण के लिए सामूहिक भागीदारी ही आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण दे सकती है.
