– चुनिहारी टोला, मिरजानहाट, घंटाघर, आनंद चिकित्सालय रोड समेत बड़ी खंजरपुर, तिलकामांझी में चैत्र कृष्ण पक्ष अष्टमी पर श्रद्धालु घर में नहीं जलायेंगे चूल्हा और बासी व्यंजन का लगेगा भोग
11 मार्च को चैत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर माता शीतला का विशेष पूजन किया जायेगा. इसमें उन्हें ठंडे और बासी भोजन का भोग लगाया जायेगा. इस दिन भक्त भी बासी व ठंडा खाना ग्रहण करेंगे. मारवाड़ी बहुल चुनिहारी टोला, मिरजानहाट, घंटाघर, आनंद चिकित्सालय रोड समेत बड़ी खंजरपुर, मिरजानहाट, तिलकामांझी में चैत्र कृष्ण पक्ष अष्टमी पर श्रद्धालु घर में नहीं जलायेंगे चूल्हा और बासी व्यंजन का भोग माता शीतला को लगायेंगे.ज्योतिषाचार्य आचार्य विष्णु पाठक ने बताया कि इस वर्ष शीतलाष्टमी 11 मार्च बुधवार को पड़ रही है. भक्त 10 मार्च को सायं काल भोजन बनाकर के 11 मार्च को प्रातः माता शीतला को भोग लगा कर के बासी भोजन ही प्रसाद स्वरूप ग्रहण करेंगे. गुड़ के गुलगुले, गुड़ के चावल, मालपुआ, दही की राबड़ी माता शीतला को अति प्रिय है. बुधवार 11 मार्च को भक्तजन भी माता शीतला को भोग लगाकर के यही भोग स्वयं भी पाएंगे. माता अपने भक्तों को एवं विशेषकर छोटे बच्चों को आरोग्यता प्रदान करती है. इस मौसम में होने वाली बीमारियों से भी हम सभी को आरोग्यता मिलती है.
राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात और पश्चिम बंगाल में बहुत हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है. कई श्रद्धालु 11 मार्च बुधवार के अतिरिक्त सोमवार नौ मार्च को भी शीतला माता का बास्योड़ा का पर्व मना सकते हैं. 11 मार्च बुधवार को ही शीतला माता का बास्योड़ा मानना श्रेष्ठ एवं श्रेयस्कर होगा.होली के आठ दिन बाद होता है बसौड़ा का त्योहार
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अष्टमी को घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है और सप्तमी की रात को ही हलवा, पूड़ी व रबड़ी जैसे व्यंजन तैयार कर लिए जाते हैं. शीत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत के संधि काल में शीतला अष्टमी आती है. मां शीतला को चेचक, खसरा और त्वचा रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है.माता शीतला के भक्त चांद झुनझुनवाला ने बताया कि शीतला माता की कृपा के पाने के लिए बसौड़ा के दिन शीतलाष्टक स्तोत्र का पाठ जरूर करना चाहिए. ऐसी मान्यता है कि शीतलाष्टक स्तोत्र की रचना भगवान शंकर ने जनकल्याण के लिए की थी. इसमें शीतला देवी की महिमा का गुणगान किया गया है. यदि भक्त रोजाना इसका पाठ करें, तो उस पर हमेशा माता शीतला की कृपा बनी रहती है. शीतला अष्टमी या बसौड़ा के दिन से इसका पाठ करने की शुरुआत कर सकते हैं.
