07 से 09 अगस्त 2026 तक आयोजित महात्मा गांधी के अंग प्रदेश (भागलपुर व आसपास का क्षेत्र) आगमन के शताब्दी समारोह के अवसर पर एक विशेष स्मारिका का प्रकाशन किया गया है. 'महात्मा गांधी का आगमन: अंग प्रदेश में' शीर्षक से प्रकाशित यह शताब्दी स्मारिका केवल आयोजन की स्मृति मात्र नहीं है, बल्कि यह गांधीजी और अंग प्रदेश के ऐतिहासिक, सामाजिक व वैचारिक संबंधों का एक बहुआयामी प्रामाणिक दस्तावेज है.
गांधी शांति प्रतिष्ठान केंद्र भागलपुर ने किया प्रकाशित
इस महत्वपूर्ण शताब्दी स्मारिका का संपादन और प्रकाशन गांधी शांति प्रतिष्ठान केंद्र, भागलपुर द्वारा किया गया है.
- संरक्षक: प्रकाश चंद्र गुप्ता और प्रो. (डॉ.) मनोज कुमार.
- प्रधान संपादक: डॉ. सुनील कुमार अग्रवाल और प्रसून लतांत.
- संपादक मंडल: डॉ. उमेश प्रसाद नीरज और डॉ. रविशंकर कुमार चौधरी.
- प्रबंध संपादक: डॉ. सुधीर मंडल और ई. सागर शर्मा.
स्मारिका की बड़ी विशेषता: विषयों की विविधता
इस स्मारिका की सबसे बड़ी खासियत इसकी विषय-विविधता है. इसमें गांधीजी को महज स्वतंत्रता आंदोलन के नेता के रूप में सीमित न रखकर सामाजिक परिवर्तन, महिला मुक्ति, धर्म, युवा चेतना, किसान, ग्राम विकास, नशामुक्ति, तकनीक और पर्यावरण जैसे समकालीन संदर्भों में प्रस्तुत किया गया है.
- विशेष आलेख: कुमार कृष्णन का आलेख 'बापू के व्रत पर आजीवन अडिग रहे शुभकरण बाबू' गांधीवाद को जीवन-संघर्ष और सार्वजनिक नैतिकता से जोड़ता है.
- वैचारिक गहराई: पद्मश्री प्रो. रामजी सिंह का आलेख स्मारिका को दार्शनिक गहराई प्रदान करता है, जबकि राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय एवं पुस्तकालय, नई दिल्ली के पूर्व निदेशक उत्तम सिन्हा का आलेख गांधीजी की ऐतिहासिक विरासत और स्मृतियों को सामने लाता है.
महिला सशक्तीकरण, खादी और स्थानीय आंदोलनों का समावेश
स्मारिका में वर्ष 1925 में भागलपुर आगमन के दौरान गांधीजी द्वारा किए गए महिला आह्वान, स्वतंत्रता संग्राम में नारियों की भूमिका और महिला सशक्तीकरण पर विशेष आलेख शामिल किए गए हैं. इसके अलावा खादी, ग्राम स्वराज, कृषि और ग्रामीण संकट पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया है. साथ ही भागलपुर झंडा कांड, चरखा आंदोलन, नशामुक्ति, सांप्रदायिक सद्भाव और समकालीन आंदोलनों (2026) पर केंद्रित सामग्री अंग प्रदेश के स्थानीय इतिहास को राष्ट्रीय गांधीवादी आख्यान से जोड़ती है.
वर्तमान समाज के लिए आत्मपरीक्षण का आईना
यह स्मारिका यह संदेश देती है कि हिंसा, असमानता, पर्यावरण संकट और नैतिक मूल्यों की गिरावट से जूझते वर्तमान समय में गांधीजी के विचारों की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है. सौ वर्षों बाद यह पुस्तक पाठकों के सामने एक जरूरी सवाल छोड़ती है कि क्या राजनीतिक आजादी के बाद हम एक न्यायपूर्ण, संवेदनशील और आत्मनिर्भर समाज का निर्माण कर पाए हैं?
