कहलगांव: 15 साल बाद बना अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का दुर्लभ महासंयोग, रोशनी से नहाईं प्रमुख ठाकुरबाड़ियां

कहलगांव में 15 वर्षों बाद अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का दुर्लभ महासंयोग बना है, जो श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के उत्सव को और भी खास बना रहा है. शहर की ठाकुरबाड़ियां फूलों और लाइटों से जगमगा उठी हैं, जहां श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक दर्शन कर रहे हैं. आधी रात को खीरे में विराजमान बाल गोपाल का प्राकट्य धूमधाम से किया जाएगा.

भागलपुर जिले के ऐतिहासिक एवं धार्मिक अनुमंडल क्षेत्र कहलगांव में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का महापर्व अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है. प्रखंड के शहरी एवं ग्रामीण अंचलों की सभी प्रमुख ठाकुरबाड़ियों को नयनाभिराम फूलों, रंग-बिरंगी विद्युत लड़ियों और आकर्षक झांकियों से सजाया गया है. इस वर्ष की जन्माष्टमी ज्योतिषीय दृष्टिकोण से बेहद खास मानी जा रही है, क्योंकि लगभग 15 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भाद्रपद कृष्ण अष्टमी पर अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और वृषभ राशि में चंद्रमा का वही पावन संयोग बना है, जो द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मकाल के समय उपस्थित था. सुबह से ही मंदिरों में दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है, वहीं आधी रात को खीरे से बाल गोपाल के प्राकट्य (प्रादुर्भाव) को लेकर व्यापक अनुष्ठानिक तैयारियां पूरी कर ली गई हैं.

15 साल बाद बना द्वापर युग जैसा दुर्लभ महासंयोग

ज्योतिषीय गणना और नक्षत्रों के प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए प्रख्यात ज्योतिषाचार्य अमरेंद्र कुमार ओझा उर्फ पप्पू बाबा ने बताया:

  • श्रीकृष्ण जन्मकाल जैसा योग: इस बार मध्यरात्रि में अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और वृषभ राशि में चंद्रमा का एक साथ संचरण हो रहा है. ऐसा त्रिपुष्कर और दुर्लभ संयोग लगभग 15 वर्षों बाद निर्मित हुआ है.
  • विशेष फलदायी अनुष्ठान: ज्योतिषाचार्य के अनुसार, इस दुर्लभ मुहूर्त में किया गया व्रत, मंत्र जाप, पंचामृत अभिषेक और लड्डू गोपाल का पूजन साधक को अक्षय पुण्य और अभीष्ट फल प्रदान करता है.

कहलगांव की प्रमुख ठाकुरबाड़ियों में उत्सव का स्वरूप

ठाकुरबाड़ी / मंदिर का नामआयोजन एवं विशिष्ट सजावट (Celebration & Highlights)
जगन्नाथ स्वामी ठाकुरबाड़ीभव्य पुष्प सज्जा, विशेष आरती एवं मध्यरात्रि महाभिषेक
बटेश्वर स्थान ठाकुरबाड़ीगंगा तट पर स्थित ऐतिहासिक स्थल पर सांस्कृतिक भजन संध्या
बांके बिहारी व राधाकृष्ण मंदिरमाखन मटकी झांकी एवं बाल गोपाल का विशेष हिंडोला (झूला)
श्रीकृष्ण दुर्गा व पंचदेव श्याम मंदिरषोडशोपचार पूजन, अखंड संकीर्तन व छप्पन भोग समर्पण
हनुमान पिंडापारंपरिक वैदिक अनुष्ठान एवं श्रद्धालुओं के लिए महाप्रसाद वितरण

परंपरा के अनुसार खीरे में विराजे लड्डू गोपाल, आधी रात को होगा प्राकट्य

सनातन परंपरा के तहत बाल गोपाल के जन्म की प्रक्रिया को पूरी विधि-विधान से निभाया जा रहा है:

  • खीरे में आच्छादित स्वरूप: सुबह की षोडशोपचार पूजा के उपरांत परंपरा अनुसार लड्डू गोपाल को खीरे के भीतर विराजमान कर नए सूती/रेशमी वस्त्र से लपेट दिया गया है.
  • मध्यरात्रि में जन्मोत्सव: ठीक 12:00 बजे 'भये प्रकट कृपाला दीनदयाला' और 'जय कन्हैया लाल की' के उद्घोष के बीच खीरे का डंठल काटकर भगवान का प्राकट्योत्सव कराया जाएगा.
  • पंचामृत स्नान व 56 भोग: प्राकट्य के बाद दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से बने पंचामृत से महाभिषेक होगा. इसके बाद नयनाभिराम श्रृंगार कर कान्हा को प्रिय माखन-मिश्री, धनिया की पंजीरी और 56 प्रकार के व्यंजनों का नैवेद्य अर्पित किया जाएगा.
  • सोहर और बधाई गीत: जन्मोत्सव के दौरान स्थानीय महिलाओं द्वारा पारंपरिक लोकगीत— "नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की" और मैथिली-अंगिका सोहर गाकर मंगलकामना की जाएगी.

श्रीकृष्ण का जीवन सांस्कृतिक चेतना का संगम: डॉ. रामजी मिश्र

उत्सव के दार्शनिक पक्ष को रेखांकित करते हुए साहित्य वाचस्पति डॉ. रामजी मिश्र 'रंजन' ने कहा:

  • भगवान श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन दर्शन केवल एक अवतार की कथा नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक उत्कर्ष और शास्त्रीय मर्यादा का अनुपम संगम है.
  • उनके विचार और गीता का कर्मयोग आज के आधुनिक समाज में भी हर वर्ग को निष्काम भाव से कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने की सार्वभौमिक प्रेरणा प्रदान करते हैं.

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By Rishi Kant

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