भागलपुर. चंपापुर जैन सिद्धक्षेत्र में चतुर्मास के दौरान भगवान वासुपूज्य की पंचकल्याणक स्थली के दर्शन के लिए देश के विभिन्न स्थानों के सैकड़ों श्रद्धालु आते हैं. इसे लेकर तैयारी शुरू हो गयी है. एक ओर जहां यात्रियों के आवास एवं धर्मशाला में रंग-रोगन का कार्य शुरू हो गया है वहीं पूजन व विधान की व्यवस्था की जा रही है. राजस्थान से आ रहे अष्टमंगल द्रव्य व मध्यप्रदेश के जबलपुर से विशेष कलश सिद्धक्षेत्र मंत्री सुनील जैन ने बताया कि इस बार जैन धर्मावलंबियों के लिए 28 जुलाई से चार माह तक चतुर्मास होगा. समापन आठ नवंबर को होगा. 16 सितंबर को दशलक्ष्ण महापर्व का शुभारंभ होगा जबकि. 25 सितंबर को भगवान वासुपूज्य का निर्वाण महोत्सव होगा. इस दौरान देश-विदेश के यात्री बड़ी संख्या में आयेंगे. इसे लेकर राजस्थान से अष्टमंगल द्रव्य, मध्यप्रदेश जबलपुर से अभिषेक के लिए विशेष कलश मंगाये जा रहे हैं. इसके अलावा यात्रियों के ठहरने व भाजन की व्यवस्था की जा रही है. पूज्य माता आर्यिका का मिलेगा समागम सिद्धक्षेत्र दर्शन के लिए मुनिराज व आर्यिका साध्वी का आगमन प्रत्येक वर्ष होता है. इस बार पूज्य माता आर्यिका का समागम भक्तों को मिलेगा. अन्य संतों के भी पधारने की संभावना है. कोई न कोई मुनिराज हरेक वर्ष चतुर्मास के दौरान जरूर आते हैं. इस दौरान सैकड़ों श्रद्धालु भी विभिन्न प्रांतों से आते हैं. व्रत त्याग, भक्ति और शुभ कर्म में चार माह बीताना है चतुर्मास सिद्धक्षेत्र मंत्री सुनील जैन बताते हैं कि चतुर्मास व्रत त्याग, भक्ति और शुभ कर्म में चार माह बीताने को कहते हैं. चतुर्मास खुद को जानने तथा अन्य जीवों की प्राण रक्षा व अभयदान का अवसर है. चतुर्मास पर्व अर्थात चार माह की साधना और पूजापाठ का आयोजन है. जैन धर्म अहिंसा पर आधारित है. जैन धर्म में जीवों के प्रति शून्य हिंसा पर जोर दिया जाता है. बारिश के मौसम में कई प्रकार के कीड़े सूक्ष्म जीव, जो आंखों से दिखाई नहीं देते हैं, वे सर्वाधिक सक्रिय हो जाते हैं. ऐसे में मनुष्य के आवागमन के कारण इन जीवों को नुकसान पहुंच सकता है.
अत: इन जीवों को परेशानी नहीं हो और जैन संतों से कम से कम हिंसा हो. इसलिए चतुर्मास में चार माह एक स्थान पर रूक कर तप, प्रवचन तथा योग साधना करते हैं. श्रद्धालुजन भी इन चतुर्मास के अवसर पर साधु-संतों की सेवा में संलिप्त होकर अपने जीवन सुधार का उपक्रम करते हैं. स्वास्थ्य व वैज्ञानिक दृष्टि से भी चातुर्मास है महत्वपूर्ण
चातुर्मास संतों के अनुभव ज्ञान और सत्संग का लाभ उठाने का अनुपम अवसर है. धार्मिक महत्व के साथ स्वास्थ्य और वैज्ञानिक दृष्टि से भी चतुर्मास में व्रत और परहेज-संयम आदि करना महत्व रखता है. इस समय बारिश होने से हवा में नमी बढ़ जाती है. इसके कारण वैक्टिरिया और कीड़े-मकौड़े व जीव-जंतु बहुत पनपते हैं. शरीर की प्रतिरोधक क्षमता, पाचन शक्ति कम हो जाती है. इसलिए उक्त चार माह में विवाह संस्कार, जात कर्म संस्कार गृह प्रवेश आदि मंगल कार्य भी निषेध माने गये हैं.
