भागलपुर जिले के नवगछिया अनुमंडल अंतर्गत गोपालपुर, राघोपुर और इस्माईलपुर-बिंदटोली इलाके में दशकों से जारी गंगा का विनाशकारी कटाव अब महज एक 'प्राकृतिक आपदा' नहीं, बल्कि गंभीर मानवीय व तकनीकी चूक के संदेह के घेरे में आ गया है. स्थानीय जानकारों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच यह विमर्श तेज हो गया है कि करीब 30 वर्ष पूर्व विक्रमशिला सेतु निर्माण के समय नाथनगर के पास गंगा की मूल धारा और प्रवाह तंत्र में किए गए बदलाव का दीर्घकालिक असर आज डाउनस्ट्रीम के गांवों पर तबाही बनकर टूट रहा है. हर साल तटबंधों के टूटने और करोड़ों के कटाव निरोधी कार्यों के बह जाने के बाद अब मांग उठ रही है कि केंद्रीय जल आयोग और जल संसाधन विभाग पुराने हाइड्रोलॉजिकल नक्शों को खंगालकर इसकी उच्चस्तरीय वैज्ञानिक जांच कराए.
क्या विक्रमशिला सेतु निर्माण के दौरान हुआ था बड़ा हस्तक्षेप?
करीब 4.7 किलोमीटर लंबा विक्रमशिला सेतु (जिसका निर्माण 1990 के दशक में शुरू हुआ और 2001 में चालू हुआ) उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने वाली जीवनरेखा है, लेकिन इसके तकनीकी पहलुओं पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं:
- धारा को सीमित करने का असर: सेतु निर्माण के दौरान नाथनगर और आसपास के क्षेत्रों में गंगा के विशाल पाट और प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए धारा के साथ मानवीय हस्तक्षेप किए गए थे.
- नदी विज्ञान (हाइड्रोलॉजी) का नियम: नदी के प्रवाह को जबरन मोड़ने या सीमित करने से धारा का वेग (Velocity), सिल्ट का जमाव और नदी तल (Riverbed) का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है. विशेषज्ञों के मुताबिक, अपस्ट्रीम में किया गया मामूली बदलाव भी कई किलोमीटर दूर डाउनस्ट्रीम में किनारों पर प्रचंड दबाव पैदा करता है.
डाउनस्ट्रीम में तबाही: राघोपुर, गोपालपुर और इस्माईलपुर पर अस्तित्व का संकट
विक्रमशिला सेतु के चालू होने के बाद के वर्षों में डाउनस्ट्रीम के इलाकों में कटाव का पैटर्न अप्रत्याशित रूप से आक्रामक हुआ है:
- सालाना विस्थापन का दंश: इस्माईलपुर-बिंदटोली, राघोपुर, बिंदटोली और गोपालपुर के तटवर्ती इलाकों में हर साल सैकड़ों एकड़ उपजाऊ भूमि और रिहायशी बस्तियां गंगा के गर्भ में समा रही हैं.
- करोड़ों की योजनाएं बेअसर: हर साल बाढ़ के समय बोल्डर पिचिंग, जियोबैग और पाइलिंग पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं, लेकिन अगली बाढ़ में नदी नए सिरे से कटाव शुरू कर देती है.
पुराने नक्शे और सैटेलाइट डेटा की तुलनात्मक जांच जरूरी
कटाव की समस्या से स्थायी निजात पाने के लिए अब 'फ्लड फाइटिंग' से आगे बढ़कर वैज्ञानिक समाधान की मांग की जा रही है:
- पुराने नदी मानचित्रों का अध्ययन: विक्रमशिला सेतु निर्माण से पूर्व (1990 से पहले) की गंगा की मूल धारा और वर्तमान प्रवाह तंत्र के नक्शों का मिलान किया जाए.
- सैटेलाइट व हाइड्रोलॉजिकल सर्वे: केंद्रीय जल आयोग (CWC) और जल संसाधन विभाग को 30 साल के सैटेलाइट इमेजरी और हाइड्रोलॉजिकल डेटा का विश्लेषण करना चाहिए कि नदी तल की गहराई और दबाव किस दिशा में शिफ्ट हुआ है.
- रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग: क्या सेतु निर्माण से पहले और बाद में पर्यावरण व नदी प्रवाह के प्रभाव का कोई वैज्ञानिक ऑडिट हुआ था? यदि हुआ, तो उसकी रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
सिर्फ बोल्डर गिराना समाधान नहीं, नीति बदलने का वक्त
हर साल आपदा के समय राहत शिविर लगाना और कटाव स्थलों पर मिट्टी-बोल्डर डालना केवल फौरी राहत है. जब तक गंगा की समूची धारा, तलछट के जमाव और हाइड्रोलॉजिकल व्यवहार का समग्र वैज्ञानिक अध्ययन नहीं होगा, तब तक गोपालपुर और राघोपुर के ग्रामीणों पर विस्थापन की तलवार लटकती रहेगी. सवाल साफ है— क्या दशकों पहले विकास की आड़ में नदी के प्रवाह से हुई छेड़छाड़ की भारी कीमत आज तटवर्ती ग्रामीण अपने घर-जमीन गंवाकर चुका रहे हैं?
