मुख्य बातें
भागलपुर से ललित किशोर मिश्र की रिपोर्ट
Bhagalpur Pink Bus Investigation Report: महिलाओं और छात्राओं को सुरक्षित एवं सुविधाजनक यात्रा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई पिंक बस सेवा भागलपुर में गंभीर आर्थिक चुनौतियों से जूझ रही है. हालात ऐसे हैं कि पिछले छह महीनों में बसों में 28 लाख 8 हजार रुपये का CNG भरा गया, जबकि आय मात्र 19 लाख 44 हजार रुपये ही हो सकी. यानी बसों की कमाई ईंधन खर्च तक नहीं निकाल पा रही है. लगातार बढ़ते घाटे ने पिंक बस सेवा के संचालन मॉडल और रूट प्लानिंग पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
महिलाओं की सुरक्षा के लिए शुरू हुई थी पिंक बस
बिहार सरकार ने छात्राओं और महिलाओं को सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराने के लिए राज्य के विभिन्न शहरों में पिंक बस सेवा शुरू की थी. भागलपुर में जून 2025 से इस सेवा का संचालन आरंभ हुआ. उम्मीद थी कि बड़ी संख्या में महिलाएं और छात्राएं इसका लाभ उठाएंगी, लेकिन एक वर्ष बाद भी अपेक्षित यात्री नहीं मिल पा रहे हैं.
स्थिति यह है कि कई बार बसों की सीटें पूरी तरह भर भी नहीं पाती हैं. कम यात्रियों के कारण निगम को लगातार आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है.
छह माह से लगातार घाटे में चल रही सेवा
परिवहन निगम के आंकड़ों के अनुसार पिछले छह महीनों से पिंक बस सेवा लगातार घाटे में चल रही है. पहले कभी-कभार कुछ दिनों में CNG खर्च की भरपाई हो जाती थी, लेकिन अब स्थिति और खराब हो गई है.
भागलपुर शहर में संचालित छह पिंक बसों में महिलाओं की संख्या अपेक्षा से काफी कम है. जबकि सुरक्षा और सुविधा के लिहाज से ये बसें अन्य सार्वजनिक परिवहन साधनों की तुलना में बेहतर मानी जाती हैं.
28 लाख का CNG, लेकिन आय 20 लाख से भी कम
पिंक बस सेवा के आर्थिक आंकड़े चौंकाने वाले हैं. पिछले छह महीनों में बसों में लगभग 28 लाख 8 हजार रुपये का CNG भरा गया. इसके मुकाबले टिकटों से प्राप्त कुल आय मात्र 19 लाख 44 हजार रुपये रही.
जानकारी के अनुसार एक बस में प्रतिदिन औसतन 2200 रुपये का CNG भराया जाता है, जबकि एक दिन की औसत कमाई करीब 1800 रुपये ही हो पाती है. इसका अर्थ है कि बसें अपने ईंधन खर्च तक की भरपाई नहीं कर पा रही हैं. यदि चालक, परिचालक, रखरखाव और अन्य प्रशासनिक खर्चों को भी जोड़ दिया जाए तो वास्तविक घाटा और अधिक बढ़ जाता है.
क्या गलत रूट चयन बना घाटे की वजह?
स्थानीय लोगों का मानना है कि पिंक बसों का संचालन मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों तक सीमित है, जबकि नाथनगर, सबौर, जगदीशपुर और आसपास के इलाकों से प्रतिदिन बड़ी संख्या में छात्राएं और महिलाएं भागलपुर शहर आती-जाती हैं.
यदि इन क्षेत्रों तक पिंक बस सेवा का विस्तार किया जाए तो यात्रियों की संख्या बढ़ सकती है. इससे महिलाओं को सुरक्षित यात्रा का बेहतर विकल्प मिलेगा और निगम की आय में भी सुधार संभव है.
ऑटो और ई-रिक्शा पर अधिक निर्भर हैं महिलाएं
जांच में यह भी सामने आया कि अधिकांश छात्राएं और महिलाएं आज भी ऑटो और ई-रिक्शा को प्राथमिकता देती हैं. कम दूरी, अधिक उपलब्धता और घर के नजदीक पहुंचने की सुविधा के कारण पिंक बस सेवा को अपेक्षित यात्री नहीं मिल पा रहे हैं.
यही वजह है कि सरकार की महत्वाकांक्षी योजना होने के बावजूद बसों का परिचालन आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं बन पा रहा है.
निगम ने महिलाओं से की अपील
भागलपुर पथ परिवहन निगम के क्षेत्रीय प्रबंधक अमित कुमार ने कहा कि सरकार महिलाओं और छात्राओं की सुरक्षित यात्रा के लिए पिंक बस सेवा चला रही है, लेकिन इसका उपयोग अपेक्षित स्तर पर नहीं हो रहा है.
उन्होंने महिलाओं और कॉलेज जाने वाली छात्राओं से अधिक से अधिक पिंक बस का उपयोग करने की अपील की. साथ ही कहा कि यदि किसी क्षेत्र से बड़ी संख्या में महिलाएं प्रतिदिन शहर आती-जाती हैं और वहां बस सेवा की जरूरत है तो वे निगम कार्यालय को जानकारी दें. मांग के अनुसार नए रूटों पर बस संचालन पर विचार किया जाएगा.
सवालों के घेरे में योजना की व्यवहारिकता
पिंक बस सेवा का उद्देश्य सराहनीय है, लेकिन भागलपुर में सामने आए आंकड़े बताते हैं कि केवल बस उपलब्ध करा देने से योजना सफल नहीं हो सकती. यात्रियों की जरूरत, रूट चयन, समय निर्धारण और जनजागरूकता पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा. अन्यथा महिलाओं की सुरक्षा के लिए शुरू की गई यह महत्वपूर्ण योजना लगातार घाटे का सौदा बनी रह सकती है.
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