भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में भागलपुर की माटी का योगदान हमेशा याद रखा जाएगा. भागलपुर की माटी का भारतीय स्वाधीनता संग्राम में गहरा योगदान रहा है. सोचिए, महज़ 25 साल के एक युवा ने विदेशी धरती पर, जहाँ आज़ादी की कल्पना भी मुश्किल थी, अंग्रेजों के खिलाफ एक ऐसा जाल बुना जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गूंज उठा. आनंद मोहन सहाय ऐसे ही एक जुझारू सेनानी थे, जिन्होंने अपनी 25 वर्ष की युवावस्था में ही विदेशी धरती पर जाकर अंग्रेजों के खिलाफ एक अंतरराष्ट्रीय जाल रच दिया था.
उनका जीवन का लक्ष्य था जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया में बसे अप्रवासी भारतीयों को एकजुट कर स्वतंत्रता आंदोलन की आग जलाना और दुनिया का जनमत तैयार करना. इसी काम ने आगे चलकर नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज (INA) के लिए एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय समर्थन तैयार किया.
वंदे मातरम् का जयघोष: स्कूली दिनों का विद्रोह
वरिष्ठ पत्रकार और शोधकर्ता कुमार कृष्णन के शोध के अनुसार, आनंद मोहन सहाय का जन्म 10 सितंबर 1898 को भागलपुर के नाथनगर अंतर्गत पुरानीसराय गांव में लालमोहन सहाय के घर हुआ था. बाल्यकाल से ही उनके मन में अंग्रेजी हुकूमत के प्रति तीव्र विद्रोह था.
वर्ष 1916 में टीएनबी कॉलेजिएट हाई स्कूल में पढ़ाई के दौरान उन्होंने कक्षा में 'वंदे मातरम्' का ज़ोरदार नारा लगाया, जिसके लिए उस समय की सरकार ने उन्हें दंडित भी किया. इसी दौरान वे ढाका की क्रांतिकारी अनुशीलन समिति के गुप्त अभियानों से जुड़ गए.
आज़ादी की पुकार पर डॉक्टरी का त्याग
1920 में जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन का बिगुल फूंका, तो सहाय ने अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और आंदोलन में कूद पड़े. 1921 से 1923 तक उन्होंने देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद के निजी सचिव के रूप में काम किया.
उन्होंने बापू के साथ देशव्यापी भ्रमण कर जनमत जुटाया और साबरमती आश्रम में भी समय बिताया. 1922 के गया कांग्रेस अधिवेशन में उनकी पहली ऐतिहासिक मुलाकात सुभाषचंद्र बोस से हुई, जहां सहाय को बोस के सत्कार की जिम्मेदारी मिली थी.
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की आवाज़: जापान में फहराया तिरंगा
मई 1923 में वे जापान पहुंचे और नागासाकी में भारतीयों को संगठित करने का बीड़ा उठाया. वे छद्म व्यापारी का रूप धरकर चीन, मलाया और इंडोनेशिया तक स्वतंत्रता का संदेश लेकर गए. अप्रैल 1927 में देशबंधु चितरंजन दास की भतीजी सती सेन से उनका विवाह हुआ. इस दौरान भी वे सक्रिय रहे और जापान में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूती देते रहे. नेताजी की सलाह पर वे फिर से जापान लौटे और 1928 में जापान में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली आधिकारिक शाखा स्थापित की.
1930 में उन्होंने अंग्रेजी और जापानी भाषा में द्विभाषी मासिक पत्रिका 'वॉयस ऑफ एशिया' की शुरुआत की, जो जापानी समाज में भारत की आजादी की आवाज़ बनी. इस गुप्त मिशन में नाथनगर के मीर और मुर्तुजा जैसे स्थानीय सहयोगियों ने भी भारत-जापान के बीच महत्वपूर्ण संदेशवाहक की भूमिका निभाई.
1943 में आजाद हिंद सरकार के महासचिव और अंडमान का प्रशासनिक मोर्चा
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब ब्रिटिश सत्ता दक्षिण-पूर्व एशिया में कमजोर पड़ी, तो सहाय ने टोक्यो और बैंकॉक सम्मेलनों में पुरजोर वकालत की कि आंदोलन को केवल नेताजी ही सही मोड़ दे सकते हैं.
अक्टूबर 1943 में जब सिंगापुर में आजाद हिंद की अंतरिम सरकार का गठन हुआ, तो नेताजी ने आनंद मोहन सहाय को सरकार का महासचिव (कैबिनेट स्तर) नियुक्त किया. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को आजाद हिंद सरकार के अधिकार क्षेत्र में लाने की रणनीतिक वार्ताओं में सहाय ने जापान के साथ अग्रणी भूमिका निभाई.
विदेश सेवा में राजदूत की कमान और महिला शिक्षा को समर्पित जीवन
1947 में देश आजाद होने के बाद भारत सरकार ने उनके अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हुनर का इस्तेमाल किया. वे 1954 में हनोई में काउंसिल जनरल और 1956 में बैंकॉक (थाईलैंड) में भारत के राजदूत नियुक्त किए गए. इसके अलावा उन्होंने वेस्टइंडीज और मॉरीशस में भी कूटनीतिक सेवाएं दीं.
1 जनवरी 1960 को विदेश सेवा से अपनी मर्ज़ी से रिटायरमेंट लेने के बाद वे पूरी तरह भागलपुर में समाज सेवा और शिक्षा फैलाने में जुट गए. नाथनगर बालिका उच्च विद्यालय और भागलपुर के मशहूर सुंदरवती महिला महाविद्यालय (एसएम कॉलेज) के विकास में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा.
13 फरवरी 1991 को इस महान क्रांतिकारी ने अपनी अंतिम सांस ली. उनकी जयंती पर उनका पूरा जीवन आज भी नई पीढ़ी को देशप्रेम और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की अनोखी प्रेरणा देता है.
