भागलपुर में बढ़ रहा है प्रदूषण का स्तर, बिहार के दूसरे प्रमुख शहरों का भी हाल खराब

विकास सिन्हा भागलपुर: भागलपुर सहित बिहार-झारखंड के कई शहरों का मौसम खराब होती जा रही है. वातावरण इतनी प्रदूषित हो रहा है कि अब बिना मास्क के जीवन जीना दूभर है. भागलपुर के अस्पतालों में रोजाना मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है. टीबी से ज्यादा मरीज अस्पतालों में भर्ती हो रहे हैं. ऐसा नहीं […]

विकास सिन्हा

भागलपुर: भागलपुर सहित बिहार-झारखंड के कई शहरों का मौसम खराब होती जा रही है. वातावरण इतनी प्रदूषित हो रहा है कि अब बिना मास्क के जीवन जीना दूभर है. भागलपुर के अस्पतालों में रोजाना मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है. टीबी से ज्यादा मरीज अस्पतालों में भर्ती हो रहे हैं. ऐसा नहीं है कि यह आलम भागलपुर का ही है. यह स्थिति पूरे बिहार व झारखंड की बन गयी है.


सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने जारी किये डाटा

देश के सभी राज्यों की राजधानी सहित कई शहरों में प्रदूषण स्तर दिनोंदन बढ़ता जा रहा है. यह अब इस स्तर पर जा पहुंचा है कि लोग बीमार हो रहे हैं. बिना मास्क के लोगों को निकलना दूभर हो गया है. ताजा आंकड़े यह कह रहे हैं कि देश भर में सबसे ज्यादा प्रदूषित टॉप फाइव शहरों में पटना और मुजफ्फरपुर भी शामिल हैं. इस डाटा से भागलपुर भी अछूता नहीं है.

सांस लेने लायक नहीं है हवा

अगर निजी व सरकारी एजेंसी की डाटा पर गौर करें, तो भागलपुर में सांस लेने लायक हवा नहीं है. एक नजर प्यूरिटी और क्लीन हवा के स्तर कोडालें तो वायु गुणवत्ता 62.50 पीएम पर पहुंच चुका है. जीवन के लिए जरूरी पेयजल की भी स्थिति खतरनाक ही है. पेयजल की गुणवत्ता 66.67 पर पहुंच चुकी है, जबकि यह 30 के नीचे होनी चाहिए.

क्यों है ऐसा

भागलपुर शहर गंगा के तट पर बसा एक ऐतिहासिक शहर है, लेकिन दिनोंदिन गंगा प्रदूषित होती जा रही है. कचड़े के अंबार से गंगा भरती जा रही है. गाद से गंगा खुद भर चुकी है. ऐसे में पेयजल की गुणवत्ता नीचे जा रही है. गंगा के तट पर बसे मोहल्लों में कई घरों में पीने लायक पानी नहीं आ पा रहा है. चार से छह घंटे पानी रखने में ही पानी पीला व लाल हो जाता है. इसका एक मात्र कारण गंगा का प्रदूषित होना है. भागलपुर के चारों ओर पुआल जलने के कारण भी वायु प्रदूषण एक कारण बन रहा है. गांवों में आज भी लोग गैस के चुल्हे के बजाय लकड़ी व पत्ते का प्रयोग कर रहे हैं. भागलपुर शहर नाॅर्थ ईस्ट के राज्यों को जोड़ता है, लाखों वाहनों का आवागमन का मुख्य मार्ग होने के कारण सड़कों पर धूल व धुआं वातावरण में शामिल हो जाता है. इससे आम लोग सबसे ज्यादा परेशान हैं. घरों से लोग नहीं निकल पाते हैं.

क्या कहते हैं डॉक्टर

जेएलएनएमसीएच की डॉ दिव्या सिंह ने बताया कि हवा की खराब गुणवत्ता का असर शहर में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है. इसके कारण दमा, कैंसर और सांस के मरीजों की संख्या बढ़ रही है. स्मॉग का बच्चों और अस्थमा के मरीजों पर बुरा असर पड़ता है. स्मॉग में छिपे केमिकल के कण अस्थमा के अटैक की आशंका को और ज्यादा बढ़ा देंगे. साथ ही आंखों में जलन भी हाेती है. ब्रोंकाइटिस यानी फेफड़े से संबंधित बीमारी के मामले बढ़ जाते हैं. फेफड़ों कमजोर हाे सकते हैं जिससे लोगों को तकलीफ बढ़सकती है.

लॉ के शिक्षक व स्थानीय निवासी शुभागम कुमार कहते हैं कि भागलपुर की आबोहवा दिनोंदिन बदलती जा रही है. इससे गंभीर बीमारियां पैदा हो रही हैं. लोग अब भी सुधरें, नहीं तो इसके गंभीर परिणाम निकल कर आयेंगे. हमें गंगा को प्रदूषण से तो बचाना ही है, साथ ही पेड़-पौधे भी भारी संख्या में लगाने होंगे, तब जाकर वातावरण जीने लायक बनेगी.

आदमपुरनिवासी श्वेत कमल बताते हैं कि इन दिनों भागलपुर का वातावरण प्रदूषित हो चुका है. रोजाना हजारों ट्रकों का आवागमन व धूल से सांस लेने में परेशानी हो रही है. लोग अब मास्क पहनने लगे हैं. टीबी जैसे बीमारी से लोग ग्रसित हो रहे हैं.

विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय अध्ययन केंद्र के प्रधान अन्वेक्षक प्रो एसएन पांडेय कहते हैं कि इसरो द्वारा रिसर्च केलिए तिलकामांझी विश्वविद्यालय का चयन किया गया है. फिलहाल इस रिसर्च में तीन लोगों की टीम है. प्रत्येक दिन संग्रह किये गये डाटा के काम का आकलन किया जाता है. इसमें दो शोध छात्र भी हैं और एक प्रोफेसर भी, जो इस काम काे बेहतर तरीके से अंजाम दे रहे हैं.

इको फ्रेंडली नहीं रहा वातावरण

भागलपुर स्थित तिलकामांझी विश्वविद्यालय के गांधी विचार विभाग से जुड़े प्रो विजय रॉय का कहना है कि अब भागलपुर की आबोहवा इको फ्रेंडली नहीं रही. एक जमाना था जब यहां के स्वच्छ वातावरण के कारण लोग यहां छुट्टियां मनाने आया करते थे. लेकिन वर्तमान में प्रदूषण इतना बढ़ चुका है कि लोग बीमार हो रहे हैं. लोगों को गंभीर बीमारियां होती जा रही हैं.

भरती हो रहे हैं टीवी के मरीज

भागलपुर में प्रदूषण के कारण टीबी के मरीजों की संख्या बढती जा रही है. डॉक्टरों का भी कहना है कि इसका सबसे बड़ा कारण प्रदूषित हवा है. प्रदूषित हवा फेफेड़ों में जाकर जमा हो जाता है. जो आंकड़े सामने आये हें, वे डराने वाले हैं.

वर्ष मरीज जांच
2012 2842 19829
2013 2924 18858
2014 2505 19526
2015 2367 18869
2016 2322 18927
2017 2141 14636

जानें रिसर्च को

नेशनल वेजीटेशन कॉर्बन पुल एसेसमेंट प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य विभिन्न जैव परिस्थितीय तंत्र जैसे वन, वन उजाड़, रेलवे, सड़क व नहर के किनारे लगे पेड़-पौधे, कृषि भूमि व अन्य उपजाऊ भूमि में कार्बन का आकलन करना है. इसमें पेड़-पौधे को बायोमास का आकलन किया जाता है. प्रथम चरण में 50 प्लॉट व झारखंड के 46 प्लॉट को लिया गया था. इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य लान्गीच्यूड और लैटीट्यूड प्वाइंट को चिह्नित करने और वहां पर दिये गये वेजीटेशन का इनवेंटरी तैयार किया जाता है. इसके अलावा बायोमास का पता लगाया जाता है.

इसरो ने कराया है रिसर्च

भारत में वनस्पति से कार्बन के आकलन के लिए इसरो ने बिहार-झारखंड में तिलकामांझी विश्वविद्यालय का चयन किया. वर्ष 2010-11 में ही इसके पहला फेज का काम शुरू हुआ और इसकी रिपोर्ट इसरो को भेजी गयी है. इस रिपोर्ट पर यह कहा जा सकता है कि बिहार-झारखंड में वातावरण अब तक इको फ्रेंडली थी, लेकिन अब ऐसा नहीं होता दिख रहा है. प्रदूषण दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है, जो खतरनाक स्थिति में पहुंच चुका है. यह अध्ययन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र के अंतर्गत इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग की ओर से भारत में नेशनल कार्बन प्रोजेक्ट प्रोग्राम के तहत कराया गया है.

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bhagalpur news. प्रतिदिन कम से कम पांच घंटे व साप्ताहिक कार्यभार 40 घंटे से कम न हो - लोकभवन ने विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के लिए कार्यभार मानदंड सख्ती से लागू करने दिया निर्देश- लोकभवन ने पत्र में कहा, निर्धारित मानकों का कड़ाई से पालन करायेवरीय संवाददाता, भागलपुरपीजी व कॉलेज में प्रतिदिन कम से कम पांच घंटे तक कक्षाओं में उपस्थित रहना अनिवार्य है. साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि साप्ताहिक कार्यभार 40 घंटे से कम न हो. इसे लेकर लोकभवन के विशेष कार्य अधिकारी न्यायिक कल्पना श्रीवास्तव ने टीएमबीयू सहित सूबे के अन्य विश्वविद्यालयों में पत्र भेजा है. पत्र में विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के लिए कार्यभार मानदंड सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया है. विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों में शैक्षणिक गुणवत्ता सुधार को लेकर सचिवालय ने विवि प्रशासन को सख्त रुख अपनाने के लिए कहा है. शिक्षकों के कार्यभार को लेकर जारी निर्देश में स्पष्ट कहा कि निर्धारित मानकों का कड़ाई से पालन करायी जाये.लोकभवन से जारी पत्र में कहा कि पूर्णकालिक कार्यरत सभी शिक्षकों को सेमेस्टर के दौरान प्रतिदिन कम से कम पांच घंटे तक कक्षाओं में उपस्थित रहना अनिवार्य है. साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनका साप्ताहिक कार्यभार 40 घंटे से कम न हो.शैक्षणिक वर्ष में कम से कम 30 सप्ताह लागू रहेगापत्र में स्पष्ट रूप से कहा कि न्यूनतम कार्यभार एक शैक्षणिक वर्ष में कम से कम 30 सप्ताह यानी 180 कार्य दिवसों तक लागू रहेगा. साप्ताहिक 40 घंटे के कार्यभार को छह कार्य दिवसों में समान रूप से विभाजित करने का निर्देश दिया है. कहा कि यूजीसी के प्रावधानों में भी कार्यभार से संबंधित इसी तरह के मानदंड निर्धारित हैं. जिन्हें कानूनी मान्यता प्राप्त है. उनका पालन अनिवार्य है. उन मानकों को सख्ती से लागू कर बेहतर शैक्षणिक परिणाम सुनिश्चित करें.लोकभवन को मिली शिक्षकों के गायब रहने की शिकायतलोकभवन को शिक्षकों के गायब रहने की शिकायत मिल रही है. अंदरखाने की मानें, तो कुछ छात्र संगठन व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कॉलेज व पीजी विभागों में निर्धारित समय से पहले ही गायब रहने की शिकायत लोकभवन से की है. इसे लेकर कुलाधिपति सख्त होते दिख रहे है. ऐसे में कॉलेजों व पीजी विभाग का औचक निरीक्षण भी किया जा सकता है.ऑनर्स विषय छोड़ सब्सिडियरी की नहीं होती है क्लासकॉलेज में ऑनर्स विषय छोड़ सब्सिडियरी विषय की क्लास नहीं होती है. एक दिन पहले छात्र राजद के कार्यकर्ताओं ने एक कॉलेज के प्राचार्य से वार्ता के दौरान कहा था कि एमजेसी (ऑनर्स) विषय की क्लास होती है, लेकिन एमआइसी (सब्सिडियरी) विषय की क्लास नहीं होती है. छात्र संगठन का आरोप था कि एईसी, वीएसी व एसीसी की भी क्लास भी नहीं होती है.लोकभवन के निर्देश का हो रहा पालन - शिक्षक संगठनशिक्षक संगठन भुस्टा के महासचिव प्रो जगधर मंडल ले कहा कि लोकभवन के निर्देश का पालन हो रहा है. यूजीसी के नियमानुसार कॉलेज व पीजी विभागों में पांच घंटे तक शिक्षकों रहते हैं. सारा कार्य करते हैं. यह कोई नई बात नहीं है. शिक्षक लोकभवन के साथ है.

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