बगहा: वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (वीटीआर) में बाघों की बढ़ती संख्या वन्यजीव संरक्षण की सफलता का संकेत है, लेकिन जंगल से सटे गांवों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की चुनौती भी बढ़ती जा रही है. घने गन्ने के खेत बाघों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बनते जा रहे हैं. इसी क्रम में ठाढ़ी गांव के गन्ने के खेत में कई दिनों से मौजूद बाघ अब वहां से निकलकर धनहिया रेता की ओर पहुंच गया है.
वाल्मीकिनगर रेंजर सत्यम कुमार के मुताबिक, बाघ की गतिविधि के बाद वन कर्मियों की टीम लगातार क्षेत्र में मॉनिटरिंग कर रही है.
गन्ने के खेतों में मिल रहा छिपने का आवरण
बरसात के मौसम में गन्ने की फसल तेजी से बढ़कर घनी हो जाती है. ऐसे में बाघों को खेतों में छिपने के लिए पर्याप्त आवरण मिल जाता है. वहीं, बारिश के कारण जंगल के कई हिस्सों में पानी भरने से नीलगाय, जंगली सुअर, हिरन और चीतल जैसे वन्यजीव भी खेतों की ओर पहुंचते हैं.
शिकार की तलाश में बाघ इनके पीछे-पीछे खेतों तक आ जाते हैं. शिकार करने के बाद घने गन्ने में ही छिपकर कई दिनों तक ठहरने की संभावना रहती है.
नई टेरिटरी बना रहे बाघ
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, बाघों की संख्या में वृद्धि के साथ नये वयस्क बाघ जंगल से निकलकर आसपास के क्षेत्रों में अपनी नयी टेरिटरी तलाश रहे हैं. जंगल किनारे गन्ने के खेत उन्हें शिकार के साथ छिपने का अनुकूल वातावरण उपलब्ध करा रहे हैं. गोवंश की मौजूदगी भी बाघों के लिए आकर्षण का कारण बन रही है.
पिछले दो महीनों में बाघों के हमले में तीन लोगों की मौत के बाद मानव सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है. ऐसे में किसानों और मजदूरों को खेतों में अकेले जाने से बचने की सलाह दी जा रही है.
कैमरा ट्रैप और त्वरित चेतावनी तंत्र की जरूरत
वन विभाग बाघ की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए लगातार क्षेत्र में गश्त और मॉनिटरिंग कर रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि गन्ने के खेतों में कैमरा ट्रैप से निगरानी, बाघों की गतिविधियों का वैज्ञानिक आकलन और गांवों में त्वरित चेतावनी तंत्र को मजबूत करने की जरूरत है. इससे बाघ संरक्षण के साथ ग्रामीणों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सकेगी.
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