पश्चिम चंपारण में अनोखी खेती: बिहार के पश्चिम चंपारण में कुछ किसान ऐसी दुर्लभ धान की किस्मों की खेती कर रहे हैं, जो आम खेतों में आसानी से देखने को नहीं मिलती. इन्हीं में एक है ‘तेलंगाना सोना’ धान. इस किस्म को लेकर किसान दावा करते हैं कि इसमें शर्करा की मात्रा बेहद कम होती है और इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी कम है. हालांकि, डायबिटीज के मरीजों के लिए इसे उपयुक्त मानने से पहले चिकित्सकीय सलाह जरूरी है.
तीन दशक से दुर्लभ फसलों की खेती कर रहे विजय
पश्चिम चंपारण के किसान विजय गिरी करीब तीन दशकों से धान, गेहूं और कई दुर्लभ फसलों की खेती कर रहे हैं. उन्होंने धान की करीब 18 किस्मों के साथ रंगीन सब्जियों और फलों की भी खेती की है.
विजय के मुताबिक, इन फसलों की कई किस्में सामान्य खेती से अलग हैं और बिहार में गिने-चुने किसान ही इनके बारे में जानते हैं. उनका प्रयास दुर्लभ किस्मों को खेत तक लाने और दूसरे किसानों तक पहुंचाने का है.
‘तेलंगाना सोना’ में शर्करा कम होने का दावा
विजय के अनुसार, ‘तेलंगाना सोना’ धान में शर्करा की मात्रा बेहद कम या नगण्य होती है. उनका कहना है कि इस चावल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स सामान्य चावल की तुलना में काफी कम है.
इसी वजह से उनका दावा है कि डायबिटीज से जूझ रहे लोग भी इसका सेवन कर सकते हैं. हालांकि, यह स्वास्थ्य संबंधी दावा है और किसी व्यक्ति के लिए यह चावल कितना उपयुक्त है, यह उसकी स्वास्थ्य स्थिति और चिकित्सकीय सलाह पर निर्भर करेगा.
120 से 130 दिन में तैयार होती है फसल
विजय के मुताबिक, ‘तेलंगाना सोना’ धान की फसल करीब 120 से 130 दिनों में तैयार हो जाती है. उनका कहना है कि इस किस्म में रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होने के कारण कीट-पतंगों और बीमारियों का असर अपेक्षाकृत कम देखने को मिलता है.
बुवाई के बाद सामान्य देखभाल के साथ फसल तैयार होने की बात किसान बताते हैं. नई किस्म होने के कारण शुरुआत में विजय को खेती के दौरान कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ा, लेकिन समय के साथ पैदावार में सुधार हुआ.
कर्नाटक से मंगाया था बीज
विजय ने बताया कि ‘तेलंगाना सोना’ के बीज उन्होंने कर्नाटक से मंगवाये थे. उनके अनुसार, यह किस्म प्रोफेसर जयशंकर तेलंगाना राज्य कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित की गयी है.
धान के दाने पतले और लंबे होते हैं. यह बासमती नहीं है, लेकिन विजय के अनुसार पकने के बाद चावल में सोंधी खुशबू आती है. स्वाद और खुशबू के कारण यह सामान्य चावल से अलग अनुभव देता है.
अब दूसरे किसानों तक पहुंचाएंगे बीज
विजय का कहना है कि फसल की कटाई के बाद वह खुद बीज तैयार करेंगे. इसके बाद पश्चिम चंपारण समेत बिहार के अन्य किसानों को भी बीज उपलब्ध कराने की योजना है.
उनका उद्देश्य दुर्लभ धान की इन किस्मों को ज्यादा किसानों तक पहुंचाना है, ताकि खेती में नए विकल्प बढ़ें और ऐसी पारंपरिक या कम प्रचलित किस्में खेतों से गायब न हों.
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