Bettiah News: बिहार सरकार भले ही सूबे में ‘मेडल लाओ, नौकरी पाओ’ और खेल संरचनाओं के आधुनिकीकरण के बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है. पश्चिम चंपारण जिला मुख्यालय बेतिया से महज छह किलोमीटर दक्षिण नौतन प्रखंड के खड्डा पतहरी में अवस्थित ‘खड्डा स्टेडियम’ का भवन पिछले दो दशक (20 साल) से विभागीय उदासीनता और राजनीतिक उपेक्षा के कारण आधा-अधूरा और जर्जर पड़ा हुआ है. ग्रामीण क्षेत्र की खेल प्रतिभाओं को निखारने के उद्देश्य से शुरू की गई यह महत्वाकांक्षी योजना आज खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है, जिससे स्थानीय खिलाड़ियों और युवाओं में भारी आक्रोश व्याप्त है.
तत्कालीन खेल मंत्री के कार्यकाल में शुरू हुआ था निर्माण
जानकारी के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं को खेल की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए इस स्टेडियम के निर्माण की आधारशिला तत्कालीन खेल एवं सांस्कृतिक मंत्री रेणु देवी के कार्यकाल में रखी गई थी. खेल मैदान में भव्य स्टेडियम का निर्माण कार्य शुरू होने से क्षेत्र के प्रतिष्ठित ‘जवाहर फुटबॉल क्लब’ के खिलाड़ियों और स्थानीय खेल प्रेमियों में एक नया उत्साह और उम्मीद जगी थी. लेकिन, शुरुआती ढांचा खड़ा होने के बाद फंड की कमी या प्रशासनिक सुस्ती के कारण काम बीच में ही ठप हो गया. नतीजा यह है कि पिछले बीस वर्षों से यह भवन खंडहर में तब्दील हो रहा है.
पूर्व मंत्री नारायण प्रसाद और मनोरमा प्रसाद ने विधानसभा में उठाया मुद्दा
खड्डा के खिलाड़ियों और ग्रामीणों की पुरजोर मांग पर क्षेत्र के कई जनप्रतिनिधियों ने इस मुद्दे को लेकर आवाज उठाई. पूर्व विधायक मनोरमा प्रसाद और पूर्व मंत्री सह वर्तमान विधायक नारायण प्रसाद ने बिहार विधानसभा के सत्र के दौरान इस अधूरे स्टेडियम के निर्माण को पूरा कराने के लिए कई बार ध्यानाकर्षण और तारांकित प्रश्न उठाए.
हैरानी की बात यह है कि विधानसभा में सवाल गूंजने के बाद खेल विभाग के आला अधिकारी और तकनीकी टीम पटना से मौका मुआयना और जांच प्रक्रिया पूरी करने स्थल पर तो पहुंचे, लेकिन हर बार जांच रिपोर्ट और एस्टीमेट की फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. धरातल पर एक ईंट भी आगे नहीं जोड़ी जा सकी.
अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थके क्लब के पदाधिकारी
स्टेडियम के जीर्णोद्धार और अधूरे भवन को पूरा कराने के लिए ‘जवाहर फुटबॉल क्लब खड्डा’ के सचिव अवध बिहारी प्रसाद और वरिष्ठ सदस्य सुनील कुमार गुप्ता पिछले कई वर्षों से लगातार जिला पदाधिकारी (डीएम) से लेकर खेल विभाग के अन्य वरीय अधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं. आवेदन और स्मारकों का पुलिंदा सौंपने के बावजूद प्रशासन की ओर से केवल आश्वासन का झुनझुना ही हाथ लगा है, जिससे थक-हारकर अब खिलाड़ी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं.
इसी मैदान से दौड़कर दर्जनों युवा बने पुलिस और फौजी
प्रशासनिक उपेक्षा के दंश के बावजूद इस खेल मैदान का महत्व कम नहीं हुआ है. ग्रामीण क्षेत्र में स्थित इस स्टेडियम में हर साल भव्य राज्य स्तरीय फुटबॉल टूर्नामेंट का आयोजन होता रहता है, जिसमें बिहार और पड़ोसी राज्यों की टीमें हिस्सा लेती हैं. यहाँ आने वाले बाहरी खिलाड़ी और अधिकारी जब इस आधे-अधूरे, बदहाल स्टेडियम भवन को देखते हैं, तो स्थानीय खिलाड़ियों को भारी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है.
इस मैदान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ सुबह-शाम सैकड़ों युवा फुटबॉल, क्रिकेट और एथलेटिक्स का कड़ा अभ्यास करते हैं. इसी मैदान की मिट्टी में दौड़ का अभ्यास कर और पसीना बहाकर क्षेत्र के दर्जनों युवाओं ने बिहार पुलिस, भारतीय सेना (फौज) और अर्धसैनिक बलों में सरकारी नौकरी हासिल की है. इतने शानदार ट्रैक रिकॉर्ड के बावजूद इस मैदान और स्टेडियम को विभागीय उपेक्षा का शिकार छोड़ देना चंपारण की खेल प्रतिभाओं के भविष्य पर सीधे तौर पर ताला लगाने जैसा है. स्थानीय खेल प्रेमियों ने एक बार फिर सरकार से मांग की है कि बजट आवंटित कर इस अधूरे स्टेडियम का निर्माण अविलंब पूरा कराया जाए.
पश्चिमी चंपारण के नौतन से राजकुमार पासवान की रिपोर्ट
