बेगूसराय के इस प्राचीन मंदिर की 3600 एकड़ जमीन भू-माफ़ियाओं के कब्जे में, अयोध्या से जुड़ा है इतिहास

Begusarai News: बेगूसराय जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर बखरी प्रखंड के सलोना गांव में स्थित "सलोना बड़ी ठाकुरबारी स्वर्णिम इतिहास के बावजूद भी वर्तमान समय में प्रशासनिक व राजनैतिक उदासीनता और अतिक्रमणकारियों के आघात झेलने को विवश है.

Begusarai News:(विपिन मिश्रा ) आज से दो दसक पहले तक बेगूसराय के बखरी में अन्य उत्पादनों के अतिरिक्त,सिर्फ बिहार में ही नहीं, सम्पूर्ण भारत में यहां की अरहर (राहर) दाल और लाल मिर्च मशहूर था. राजस्थान के व्यापारी यहां के खेतों में लगे फसलों को पट्टा पर लेते थे.

भू-स्वंय तो लाभान्वित होते ही थे.राजस्थान के व्यापारी सहित देश के अनेकानेक व्यापारी दाल और मिर्ची के व्यापार से लाभान्वित होते थे.

तीन सौ साल पुराना सलौना ठाकुरवाड़ी और उसकी मूर्तियां

आज स्थिति क्या है यह बखरी के लोग जानते हैं. अयोध्या में राम मंदिर सभी लोग अपने-अपने कपाट पर तिलक लगाए सड़कों पर,बाज़ारों में फिर रहे हैं. परन्तु ढाई-सौ से तीन सौ साल पुराना बखरी के सलौना ठाकुरवाड़ी और उसकी मूर्तियां किन्ही को दिखती नहीं है.

यह भी भगवान् का महत्वपूर्ण स्थान था. एक ज़माने में और आज भी स्थानीय लोग इसे पुनर्जीवित करने में लगे हुए हैं. जिसमें एक बेहतरीन पर्यटन स्थल बन सकता हैं. लेकिन बदलते वक्त के संग बदली दुनिया और दब गई कहानी भी सलौना ठाकुरबाड़ी की अतीत की गहराई में जिससे सियाराम जी भी ना रहें अछूते.

आज युवा और युवती को इस मंदिर का पता तक नहीं है

शायद बेगूसराय के युवकों,युवतियों को मालूम नहीं हो,परन्तु बेगूसराय का एक छोटा सा प्रांत सलौना जो बखरी प्रखंड में स्थित है. यह आज भी कई ऐतिहासिक धरोहरों को अपने दामन में अनेकानेक कहानियां समेटे हुए हैं. लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है.

चुकी इसका कोई राजनीतिक मोल नहीं है. चुनावी बाजार में पुरानी गाथाएं वर्तमान में उपेक्षा सहते,अतीत के गहराइयो में धीरे-धीरे दफ़न हो रहे हैं. जिन धरोहरों को कभी यहाँ का गौरव माना जाता था. आज अपने हालत पर आँसू बहा रहे हैं और इस गौरवशाली इतिहास की धरोहरों को ना सरकार,ना स्थानीय रणनीतिक कार्यकर्ता व प्रशासन ही देखरेख का जिम्मा ले रहे हैं.

इसे बनाने में 16 साल लगे और यह 300 साल पुराना हैं

इसमें लगभग सवा सौ मिस्त्री और लोहार,जो सिर्फ छेनी बनाने का काम करते थे. उस समय पांच लाख रुपए से इस मंदिर निर्माण की शुरुआत की गई. 3600 बीघा जमीन की उपज से जो भी रकम आता था,वो इस मंदिर मे ही लगाया जाता था. इस मंदिर को निर्माण में जहाँ पैसे पानी की तरह बहाये गए.

निर्माण कार्य पूरा होते ही करोड़ों की राम सीता की मुर्ति भी यहाँ स्थापित की गई थी. जो इस मंदिर की कभी शोभा हुआ करती थी. आज वो भी अब नहीं है, चोरों ने उसे चोरी कर लिया. निश्चित रूप से अतीत को संजोकर ही हम वर्तमान को बेहतर कर सकते हैं.

लाल पत्थर और खूबसूरत नक्कासी से बनी है ठाकुरवाड़ी

कीमती लाल पथर से निर्मित सलोना गाँव स्थित ठाकुरबाड़ी में जहां पहले सावन माह में लाखो की संख्या में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता था. आज वीरानी इसकी पहचान बन गयी है.

पूरी मंदिर औरंगाबाद के सूर्य मंदिर की भांति खूबसूरत नक्कासी बिहार में इसे अद्वितीय बनाती है. खास बात ये कि इस मंदिर का अयोध्या कनेक्सशन इसके इतिहास को स्वर्णीम बनाता है.

मंदिर की स्थापना मुगल काल में हुई

बेगूसराय जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर बखरी प्रखंड के सलोना गांव में स्थित “सलोना बड़ी ठाकुरबारी स्वर्णिम इतिहास के बावजूद भी वर्तमान समय में प्रशासनिक और राजनैतिक उदासीनता अतिक्रमणकारियों के आघात झेलने को विवश है.

कीमती लाल पत्थर से निर्मित यह राम जानकी मंदिर अपनी खूबसूरत नक्काशी और इतिहास के वैभवशाली क्षणों के कारण खासा लोकप्रिय है.

अयोध्या राम मंदिर से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

जानकारी के मुताबिक इस मंदिर की स्थापना मुगल शासन काल में आज से लगभग 300 वर्ष पूर्व स्वामी मस्तराम के द्वारा की गई थी. अयोध्या राम मंदिर से जुड़े अभिलेख के अनुसार अयोध्या के कल्पवृक्ष में भगवान राम से जुड़ी चीजों में इस मंदिर का भी जिक्र है और मंदिर के संस्थापक के रूप में स्वामी मस्त राम का नाम उल्लेखित है.

जानकारों के मुताबिक कीमती लाल पत्थर से निर्मित ये मंदिर बिहार में अद्वितीय है. इसमें की गई नक्काशी पूरी के मंदिर और औरंगाबाद के सूर्य मंदिर की भांति काफी अकर्षक है. इसके निर्माण में 15 वर्ष का समय लगा था और उस समय पांच लाख रुपये और 36 सौ बीघे जमीन के 15 साल के फसल का मूल्य इस मंदिर में लगाया गया था.

3600 सौ एकड़ में फैला और अष्टधातु से निर्मित मूर्तियां

मंदिर में अष्टधातु से निर्मित राम जानकी बजरंगबली समेत अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा स्थापित थी. जो बाद में चोरों ने चोरी कर लिए. यहां कभी पवित्र श्रावण मास में अयोध्या से आए पंडितों और प्रवचन कर्ताओं के द्वारा यहां पर झूलन महोत्सव का आयोजन होता था.

इसमें पूरे बिहार से लाखों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते थे और हजारों लोग वहां भंडारे में प्रसाद ग्रहण करते थे. मंदिर के पास वैसे तो 36 सौ बीघा जमीन का मालिकाना हक था. लेकिन वर्तमान समय में न्यास बोर्ड के अभिलेख के आधार पर इस मंदिर के पास कई बीघा जमीन है. शेष बची जमीन पर भी स्थानीय दबंग एवं अतिक्रमणकारी गिद्ध दृष्टि लगाए हुए हैं.

मंदिर के जमीन पर लोगों का कब्जा

स्थानीय ग्रामीण बताते हैं कि सैकड़ों एकड़ जमीन पर सीपीआई के लाल झंडा के कार्यकर्ताओं ने अवैध रूप से कब्जा जमा लिया. जिस पर प्रशासन और न्यास बोर्ड कोई बड़ा कदम नही उठा सके. लोगों ने बताया कि बाकी के जमीन पर लोगों ने कब्जा जमा रखा है. उससे कई स्कूल और जनउपयोगी कार्य किए जा सकते हैं. लेकिन प्रशासन संवेदनहीन बना बैठा है.

सरकार चाहें तो मंदिर को पर्यटक स्थल बनाया जा सकता हैं

बहरहाल इतना तय है कि प्रशासन के हस्तक्षेप से न सिर्फ इस मंदिर के सैकड़ों एकड़ जमीन से अतिक्रमण हटाया जा सकता बल्कि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए इसका कायाकल्प भी किया जा सकता है. स्थानीय लोग इस मंदिर के उद्धार के लिए तारणहार की बाट जोह रहे हैं.

स्थानीय नगरवासी कहते हैं कि मंदिर में आकर और इस धरोहर को देखकर कई प्रकार के सवाल मन में आता है की कैसे कभी इस मंदिर के सहारे बसा यह गांव आज अपने आराध्य और उनकी बाड़ी को भूल गया है.

मंदिर का पुनरुद्धार नितान्त आवश्यक है और मंदिर के सहारे बहुत कुछ बेहतर किया जा सकता है. अगर यहां बेहतरीन पर्यटन स्थल बनाकर विस्तार किया जाए तो एक अदभुत प्रयास होगा. जो ना सिर्फ इस ठाकुरबाड़ी की नहीं,बल्कि सलौना और स्थानीय लोगो का भी भविष्य बदल जाएगा.

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Published by: Vivek Singh

Vivek Singh is a contributor at Prabhat Khabar.

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