40 लाख का मुक्तिधाम बना कूड़ा घर
धार्मिक और पर्यटन नगरी मंदार की तराई में करीब 20 वर्ष पूर्व 40 लाख रुपये की लागत से बना मुक्तिधाम आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है.
20 साल में जर्जर हुआ ढांचा, नगर पंचायत की अनदेखी से धूमिल हो रही मंदार की छवि
संजीव पाठक, बौंसी. धार्मिक और पर्यटन नगरी मंदार की तराई में करीब 20 वर्ष पूर्व 40 लाख रुपये की लागत से बना मुक्तिधाम आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. अंतिम संस्कार जैसी संवेदनशील प्रक्रिया के लिए तैयार किया गया यह स्थल अब जर्जर अवस्था में पहुंच चुका है. हालात इतने खराब हैं कि नगर पंचायत के सफाई कर्मी यहां कूड़ा जमा कर रहे हैं. नतीजतन, मुक्तिधाम अब कूड़ा घर में तब्दील होता जा रहा है और मंदार की प्राकृतिक व धार्मिक सुंदरता पर भी दाग लग रहा है. स्थानीय लोगों के अनुसार, लगभग 40 लाख रुपये की लागत से बनाए गए इस मुक्तिधाम में शेड, चबूतरा, शौचालय, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था की गयी थी. उद्देश्य था कि लोगों को अंतिम संस्कार के दौरान सम्मानजनक वातावरण मिल सके, लेकिन हैरानी की बात है कि निर्माण के बाद इसे व्यवस्थित रूप से कभी चालू ही नहीं किया गया. पूरा मामला फाइलों में उलझकर रह गया.
कूड़ा डंपिंग से बढ़ी बदहाली
वर्तमान में नगर पंचायत के सफाई कर्मी यहां कूड़ा जमा कर रहे हैं. चारों ओर गंदगी और दुर्गंध का माहौल है. इससे न केवल आसपास का पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, बल्कि धार्मिक स्थल की गरिमा भी प्रभावित हो रही है. मंदार क्षेत्र में आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों पर इसका नकारात्मक असर पड़ रहा है.ऐसा नहीं है कि नगर पंचायत के अधिकारियों या जनप्रतिनिधियों को इसकी जानकारी नहीं है. स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कई बार इस मुद्दे को उठाया गया, लेकिन मुक्तिधाम को गंदगी से मुक्त कर उसे पुनर्जीवित करने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गयी. हालांकि नगर पंचायत गठन के साथ लोगों को लगने लगा था कि जल्द यहां पर मुक्तिधाम आरंभ हो जाएगा और साफ सफाई की व्यवस्था मंदार पर्वत और तराई क्षेत्र में बेहतर होगी. लेकिन व्यवस्था पहले से भी बदतर हो गयी. सुलभ इंटरनेशनल से मिले सफाई कर्मी भी कूड़ा कचरा को इसी जगह फेंकने का काम कर रहे हैं.
सरकारी योजना पर भी उठे सवाल
सरकार की ओर से अब सभी पंचायतों में मुक्तिधाम बनाने की योजना चलायी जा रही है. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब 40 लाख रुपये खर्च कर बना मुक्तिधाम ही उपयोग में नहीं आ सका, तो नयी योजनाओं की सफलता कैसे सुनिश्चित होगी.
20 वर्षों में बदले कई अधिकारी, नहीं बदली तस्वीर
इन दो दशकों में कई जिलाधिकारी और संबंधित विभागों के पदाधिकारी बदले, लेकिन मुक्तिधाम की सूरत नहीं बदली. जर्जर ढांचे की मरम्मत, साफ-सफाई और संचालन को लेकर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई. मंदार जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल की पहचान और गरिमा को बचाने के लिए आवश्यक है कि संबंधित विभाग तत्काल संज्ञान ले. मुक्तिधाम को कूड़ा मुक्त कर उसका जीर्णोद्धार कराया जाय और नियमित देखरेख की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित की जाय. अन्यथा यह लाखों की योजनाओं और प्रशासनिक दावों पर गंभीर सवाल खड़े करता रहेगा.