बांका जिले के कटोरिया और चांदन प्रखंड की सीमा पर बसा आदिवासी व ग्रामीण बहुल रतनपुर गांव इन दिनों पारंपरिक पद्धति से महुआ का तेल तैयार कर स्वरोजगार का एक नया रास्ता बना रहा है. घने जंगलों से मिलने वाली महुआ के बीज (गुल्ली) को ग्रामीण अपनी सदियों पुरानी पारंपरिक तकनीक से तेल में बदलकर न केवल अपनी घरेलू आवश्यकताएं पूरी कर रहे हैं, बल्कि इसे आमदनी और रोजगार के एक सशक्त माध्यम के रूप में भी विकसित कर चुके हैं.
गांव के दर्जनों परिवारों के इस उद्यम से जुड़ने के कारण रतनपुर में अब यह एक संगठित कुटीर उद्योग का रूप ले चुका है, जहां आसपास के क्षेत्रों से भी लोग शुद्ध महुआ तेल खरीदने पहुंच रहे हैं.
पारंपरिक विधि से शुद्ध तेल की निकासी, ₹180 प्रति किलो दर
रतनपुर गांव में आज भी महुआ का तेल निकालने के लिए किसी आधुनिक मशीन के बजाय सदियों पुराने पारंपरिक जुगाड़ व यंत्र का इस्तेमाल किया जाता है. सबसे पहले जंगलों से चुने गए महुआ के बीजों (दाल) को सुखाकर उसका दरदरा पाउडर बनाया जाता है. इसके बाद इस पाउडर को पानी की गर्म भाप में अच्छी तरह उबाला जाता है.
उबले हुए मिश्रण को कपड़े में लपेटकर लकड़ी के बने दो भारी-भरकम पारंपरिक पटलों (यंत्र) के बीच रखकर दबाया जाता है. इस दबाव से बूंद-बूंद कर गाढ़ा और शुद्ध महुआ तेल बाहर टपकने लगता है.
गणेश यादव बताते हैं, 'जब हम करीब दो क्विंटल महुआ दाल पीसते हैं, तो मुश्किल से 70 किलो तेल निकलता है. यह बहुत मेहनत का काम है.' बाजार में यह तेल करीब 180 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से आसानी से बिक जाता है.
महुआ खल्ली की भी भारी मांग: धुआं भगाता है मच्छर और जहरीले जीव
तेल निष्कर्षण के बाद बचने वाले अपशिष्ट यानी महुआ की खल्ली भी ग्रामीणों के लिए कमाई का जरिया है. यह खल्ली स्थानीय स्तर पर करीब 20 रुपये प्रति पीस (टिकिया) की दर से बिकती है.
जंगली व ग्रामीण इलाकों में शाम के समय इस खल्ली को उपलों (गोइठा) के साथ सुलगाया जाता है. इसके धुएं की गंध से मच्छर, जहरीले कीड़े और सांप घरों व मवेशी बाड़ों से दूर भागते हैं. इस दोहरे उपयोग के कारण बीज से लेकर तेल और खल्ली तक कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता.
गांव के कई परिवार बने उद्यमी, देखने जुट रहे लोग
रतनपुर गांव में गणेश यादव, पंकज यादव, अजय यादव, धनेश्वर यादव, शंकर यादव और नीतीश कुमार समेत कई परिवार इस पुश्तैनी काम को बड़े पैमाने पर कर रहे हैं. आज से कुछ साल पहले तक यह काम सिर्फ कुछ परिवार ही करते थे, लेकिन अब जब दूसरे गांवों के लोग भी इस तरह से पैसे कमाते देख रहे हैं, तो वे भी जुड़ना चाहते हैं.
पारंपरिक तरीके से तेल निकालने की इस प्रक्रिया को देखने के लिए कार्यस्थलों पर स्थानीय ग्रामीणों और राहगीरों की भीड़ लगी रहती है, जो आज के मशीनी दौर में कौतूहल का केंद्र बना हुआ है.
स्वाद और सेहत का मेल: पकौड़ी, सब्जी और दर्द निवारक मालिश
स्थानीय खान-पान में महुआ तेल का विशेष स्थान है. ग्रामीणों का कहना है कि महुआ तेल में छानी गई पकौड़ी और बनी सब्जियों का स्वाद बेहद अनूठा और सोंधा होता है. पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, इस तेल में बने भोजन से पेट में गैस और अपच की समस्या कम होती है.
इसके अलावा, इसका औषधीय उपयोग भी व्यापक है. रूखी त्वचा, फटी एड़ियों और सर्दियों में शरीर के जोड़ों के दर्द से राहत पाने के लिए ग्रामीण इसे मालिश के तेल के रूप में उपयोग करते हैं.
जंगल की उपज से संवर रही आर्थिकी
कटोरिया और चांदन के जंगलों में महुआ के पेड़ों की प्रचुरता है. मार्च-अप्रैल में महुआ के फूल एकत्र किए जाते हैं, जिन्हें सुखाकर मवेशियों के पौष्टिक चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है (ज्ञात हो कि बिहार में महुआ से शराब बनाना व बेचना पूर्णतः प्रतिबंधित है).
फूल गिरने के बाद फल पकते हैं, जिसके बीजों से यह कीमती तेल निकलता है. यह चक्र ग्रामीणों को बिना किसी बड़े पूंजी निवेश के सीधे प्रकृति से रोजगार मुहैया करा रहा है.
उद्योग विभाग देगा मदद: पीएमएफएमई योजना से मिलेगा संबल
"जिला उद्योग केंद्र, बांका के महाप्रबंधक शंभु कुमार पटेल का कहना है कि सरकार पीएमएफएमई योजना के तहत इन ग्रामीणों को आधुनिक मशीनें, ट्रेनिंग और आर्थिक मदद देगी, ताकि वे अपने महुआ तेल को एक बड़े ब्रांड के रूप में विकसित कर सकें." — शंभु कुमार पटेल, महाप्रबंधक (GM), जिला उद्योग केंद्र, बांका