सुल्तानगंज-बाबाधाम कांवरिया पथ की 55 साल पुरानी धर्मशाला गुलजार, शिवलिंग के दर्शन को उमड़ रहे शिवभक्त

55 साल से अधिक पुरानी सुल्तानगंज-बाबाधाम कांवरिया धर्मशाला भादो माह में फिर गुलजार हो गई है. शिवभक्त प्राचीन गुफा और बाबा कामेश्वरनाथ शिवलिंग के दर्शन के लिए रुक रहे हैं. यह ऐतिहासिक स्थल, जो कभी अपनी रौनक खो चुका था, अब फिर से भक्तों की आवाजाही और 'हर-हर महादेव' के जयघोष से गूंज रहा है.

सुल्तानगंज से बाबाधाम तक कांवर यात्रा के दौरान भादो माह में एक बार फिर करीब पांच दशक पुरानी प्रसिद्ध कांवरिया धर्मशाला की रौनक लौट आई है. बाबा वैद्यनाथ की नगरी की ओर कांवर लेकर बढ़ रहे शिवभक्त यहां कुछ देर विश्राम करने के साथ धर्मशाला परिसर में स्थापित देवी-देवताओं की प्रतिमाओं का दर्शन कर आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त कर रहे हैं. दिनभर कांवरियों की आवाजाही और हर-हर महादेव के जयघोष से पूरा परिसर भक्तिमय बना हुआ है.

प्राचीन गुफा और शिवलिंग बने श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र

धर्मशाला परिसर में मौजूद प्राचीन गुफा कांवरियों के लिए खास आकर्षण बनी हुई है. इसके अलावा यहां स्थापित बाबा कामेश्वरनाथ शिवलिंग, बजरंगबली, भगवान गणेश, मां दुर्गा, बशाहा समेत कई देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के दर्शन के लिए भी श्रद्धालु रुक रहे हैं. कांवरिया पथ पर यह धर्मशाला अब केवल विश्राम स्थल नहीं, बल्कि आस्था और आध्यात्मिकता का महत्वपूर्ण पड़ाव बन चुकी है.

कांवरिया बाबा ने 55 साल से अधिक पहले कराया था निर्माण

बताया जाता है कि सहरसा जिले के राज सोनवर्षा गांव निवासी श्रद्धालु वीरेंद्र प्रसाद चौधरी उर्फ कांवरिया बाबा ने करीब 55 वर्ष से भी अधिक पहले इस धर्मशाला का निर्माण कराया था. उस समय सुल्तानगंज से बाबाधाम के बीच कांवरिया पथ पर इसे पहला और भव्य धर्मशाला माना जाता था. कांवर यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां ठहरते थे.

आरती की थाल लेकर भक्ति में नृत्य करते थे कांवरिया बाबा

धर्मशाला में प्रत्येक संध्या भजन-कीर्तन का आयोजन होता था. इस दौरान कांवरिया बाबा आरती की थाल लेकर भक्ति में लीन होकर नृत्य करते थे. उनका यह भक्तिमय अंदाज कांवरियों के बीच काफी लोकप्रिय था. कई श्रद्धालु विशेष रूप से उनका नृत्य देखने के लिए धर्मशाला में रुकते और भावविभोर हो जाते थे.

कांवरिया बाबा की हत्या के बाद फीकी पड़ गई रौनक

धर्मशाला के इतिहास से जुड़ी सबसे मार्मिक घटना कांवरिया बाबा की हत्या की बतायी जाती है. स्थानीय लोगों के अनुसार, श्रावणी मेला के दौरान षडयंत्र के तहत अफवाह फैलाकर कांवरिया वेश में पहुंचे अपराधियों ने उनकी हत्या कर दी थी. इस घटना के बाद धर्मशाला से जुड़ी उनकी सक्रिय भूमिका समाप्त हो गयी और धीरे-धीरे इसकी व्यवस्था एवं देखरेख प्रभावित होने लगी.

देखरेख के अभाव में जर्जर हो गयी थी ऐतिहासिक धर्मशाला

बाद के वर्षों में स्थानीय विधायक की अध्यक्षता में गठित कार्यसमिति द्वारा लंबे समय तक धर्मशाला का संचालन किया गया. हालांकि समय के साथ समुचित मरम्मत, रंग-रोगन और नियमित देखरेख के अभाव में भवन जर्जर स्थिति में पहुंच गया. कभी कांवरियों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाला यह ऐतिहासिक स्थल अपनी पुरानी चमक खोने लगा था.

अब भादो माह में एक बार फिर यहां कांवरियों की भीड़ बढ़ने से धर्मशाला का पुराना स्वरूप जीवंत होता नजर आ रहा है. श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान यात्रा की थकान मिटाने के साथ धार्मिक इतिहास और लोक आस्था से जुड़ने का अवसर भी दे रहा है. हालांकि धर्मशाला की विरासत को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए नियमित रखरखाव और संरक्षण की जरूरत है.

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लेखक के बारे में

By दीपक चौधरी

दीपक चौधरी प्रिंट माध्यम में 23 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 4 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. कटोरिया (बांका) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक गतिविधि, खेल, इतिहास और राजनीतिक गतिविधियों की खबरों में रुचि रखते हैं.

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