क्या आप जानते हैं कि बिहार का मंदार पर्वत सिर्फ पौराणिक कथाओं का ही नहीं, बल्कि बंगाल की गहरी भक्ति परंपरा का भी एक अनमोल खज़ाना है? बिहार के बांका जिले के बौंसी स्थित पौराणिक मंदार पर्वत केवल समुद्र मंथन (हिंदू पौराणिक कथाओं में देवताओं और असुरों द्वारा अमृत प्राप्त करने के लिए किया गया एक प्राचीन अनुष्ठान) और सनातन आस्था का ही केंद्र नहीं है, बल्कि बंगाल की समृद्ध वैष्णव (विष्णु के अनुयायी) और गौड़ीय भक्ति परंपरा (चैतन्य महाप्रभु द्वारा स्थापित भक्ति की एक शाखा) से भी इसका सदियों पुराना ऐतिहासिक संबंध रहा है. भगवान मधुसूदन (विष्णु का एक रूप) के दर्शन के लिए मध्यकाल से लेकर 20वीं सदी के आरंभ तक बंगाल के बड़े वैष्णव संतों का मंदार आना-जाना लगा रहा.
1507 ईस्वी में चैतन्य महाप्रभु (एक प्रमुख वैष्णव संत और समाज सुधारक) के मंदार आने के बाद वल्लभाचार्य, प्रभुपाद श्री हरिदास गोस्वामी और विजयकृष्ण गोस्वामी जैसे महान संतों ने मंदार की पवित्र धरती पर साधना की थी.
1507 में चैतन्य महाप्रभु और सत्यभानु उपाध्याय का आगमन
मंदार क्षेत्र के वरिष्ठ इतिहासकार उदयेश रवि के अनुसार, 1507 ईस्वी में जब चैतन्य महाप्रभु मंदार आए थे, तब उनके साथ उनके खास साथी सत्यभानु उपाध्याय भी मौजूद थे.
उसी गौड़ीय परंपरा का पालन करते हुए और चैतन्य-पगचिह्नों के दर्शन की ज़बरदस्त चाहत लिए बंगाल के मशहूर संत व साहित्यकार प्रभुपाद श्री हरिदास गोस्वामी 62 वर्ष की उम्र में मंदार पहुंचे थे. डाक विभाग की सरकारी नौकरी से रिटायर होकर संत बने गोस्वामीजी ने मशहूर बांग्ला नाटक 'श्रीविष्णुप्रिया' लिखी थी. उस समय के बंगाली समाज में यह माना जाता था कि उनके घर में पलने वाली मैना 'राधा-कृष्ण' का जाप करती थी और तोता संस्कृत में बात करता था.
13 जनवरी 1929: मकर संक्रांति पर दो बैलगाड़ियों से मंदार यात्रा
गोस्वामीजी की हाथ से लिखी ऐतिहासिक डायरी के पन्नों से उस समय के मंदार का एक दुर्लभ नज़ारा सामने आता है. 13 जनवरी 1929 (पौष संक्रांति/मकर संक्रांति) को वे अपने 15 साथियों के साथ दो बैलगाड़ियों पर सवार होकर मंदार पहुंचे थे.
उस दौर में भी मकर संक्रांति पर मंदार में भक्तों का भारी हुजूम उमड़ता था. लाखों भक्तों के "जय मधुसूदन" के गगनभेदी नारों के बीच भीड़ को चीरते हुए गोस्वामीजी को भगवान के साक्षात दर्शन हुए. बहुत ज़्यादा भीड़ होने के कारण गोस्वामीजी अपने साथियों से बिछड़ गए. वे मंदार में रहने वाले पुराने बंगाली निवासी और डाकबंगले के इंचार्ज गोपालचंद्र भट्टाचार्य के पास पहुंचे. डाकबंगले में सिर्फ सरकारी अधिकारियों के ठहरने का नियम था और भट्टाचार्य का अपना खपरैल वाला घर पहले से ही मेहमानों से भरा था.
ऐसे में भट्टाचार्य ने बौंसी के पहले होम्योपैथी डॉक्टर डॉ. चंद्रशेखर खवाड़े (जिनकी इकलौती संतान चंद्रतारा थीं) के पक्के मकान में गोस्वामीजी और उनके दल के ठहरने का अच्छा इंतज़ाम कराया.
हाथी पर सवार होकर निकले भगवान मधुसूदन, पापहरणी तट पर हुआ नाम-जप
डायरी के संस्मरण के अनुसार, दल के बाकी सदस्य मंदार पर्वत शिखर की यात्रा पर निकल गए, जबकि गोस्वामीजी और उनकी पत्नी ने नीचे पापहरणी सरोवर के पवित्र तट पर बैठकर घंटों हरि-नाम संकीर्तन किया.
तीसरे पहर करीब 4:00 बजे भगवान मधुसूदन पारंपरिक रिवाज़ के अनुसार हाथी (गजराज) पर सवार होकर मंदार पहुंचे. लाखों भक्तों के "जय मधुसूदन" के गगनभेदी नारों के बीच भीड़ को चीरते हुए गोस्वामीजी को भगवान के साक्षात दर्शन हुए.
उसी रात करीब 12:00 बजे वे मंदारहिल-भागलपुर पैसेंजर ट्रेन से भागलपुर रवाना हुए और नया बाज़ार में क्षितिकंठ बाबू के घर पर ठहरे, जहाँ कोलकाता की मशहूर वैष्णव साधिका निरुपमा देवी भी रह रही थीं.
मंदिर में चैतन्य विग्रह स्थापित करने की अधूरी चाहत
संत हरिदास गोस्वामी की पक्की इच्छा थी कि बौंसी स्थित भगवान मधुसूदन मंदिर के परिसर में वे अपने पैसों से चैतन्य महाप्रभु की एक दिव्य मूर्ति स्थापित कराएं. उन्होंने उस समय के तीर्थ पुरोहितों व पंडा समाज से इस बारे में लंबी बातचीत की, लेकिन उस समय सेवा भाव से नियमित पूजा की व्यवस्था पर सहमति न बन पाने की वजह से यह इरादा अधूरा रह गया.
उनकी डायरी में उस समय की व्यवस्था का ज़िक्र करते हुए यह भी लिखा है कि मंदिर और पर्वत का रखरखाव लक्ष्मीपुर रियासत के संरक्षण में चलता था.
संगमरमर पर सुरक्षित हैं महाप्रभु के चरणचिह्न, संरक्षण की ज़रूरत
हरिदास गोस्वामी की यात्रा से ठीक एक साल पहले (1928 में) गौड़ीय संप्रदाय के संतों ने उस समय की व्यवस्था से बाकायदा इजाज़त लेकर चैतन्य महाप्रभु के चरणचिह्नों को संगमरमर की शिला पर उकेरकर मंदार में स्थापित किया था, जिसके साथ संस्कृत श्लोक वाला एक पुराना शिलालेख भी लगाया गया था. इसके बाद प्रभुपाद विजयकृष्ण गोस्वामी ने भी अपनी मंदार यात्रा का पूरा विवरण संत साहित्य में लिखा.
आज धार्मिक पर्यटन के बढ़ने के बावजूद मंदार की इस समृद्ध वैष्णव विरासत और चैतन्य महाप्रभु के चरणचिह्नों से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के संरक्षण को लेकर शोधकर्ताओं को चिंता है. इतिहासकारों का मानना है कि इन यादों, दुर्लभ डायरियों और शिलालेखों को सहेजकर मंदार को राष्ट्रीय स्तर पर वैष्णव तीर्थ सर्किट से जोड़ा जाना चाहिए, जिससे यह स्थान न केवल एक ऐतिहासिक धरोहर बना रहे, बल्कि भविष्य में भी लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता रहे.
चैतन्य महाप्रभु का पद चिन्ह का मंदिर | Prabhat Khabar Network
