बौंसी : पौराणिक मंदार पर्वत की पहचान केवल समुद्र मंथन की कथा, धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक विरासत तक सीमित नहीं है. मंदार की धरती पर सदियों से भक्ति, साधना और आध्यात्मिक परंपराओं की अलग-अलग धाराएं एक-दूसरे से जुड़ती रही हैं. इसी विरासत में चैतन्य महाप्रभु की भक्ति यात्रा की स्मृतियां भी खास स्थान रखती हैं.
इतिहासकार उदयेश रवि के अनुसार, वर्ष 1505 में गौरांग चैतन्य महाप्रभु अपनी टोली के साथ मंदार पहुंचे थे. उनकी यात्रा से जुड़ी स्मृति आज भी मंदार के पूरब स्थित भगवान मधुसूदन के फगदोल मंदिर के सामने एक शिला पर अंकित चरणचिह्न के रूप में मौजूद है. श्रद्धालुओं के लिए यह स्थल आज भी आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है.
सुकिया से कुड़रो होते हुए मंदार पहुंचे थे महाप्रभु
इतिहासकार उदयेश रवि के अनुसार, बंगाल से अपनी टोली के साथ निकले चैतन्य महाप्रभु की यात्रा कई गांवों से होकर मंदार तक पहुंची थी. यात्रा के दौरान वे गोस्वामी बंगालियों की बस्ती सुकिया गांव से गुजरे थे.
इसके बाद उनका पड़ाव ‘कुरुंगावलि’ गांव में हुआ, जिसे अब कुड़रो के नाम से जाना जाता है. मान्यता है कि यात्रा के दौरान फागा गांव में भी उनका प्रवास हुआ था. बाद में ग्रामीणों ने यहां सरस्वती मंदिर की स्थापना की. इसके बाद महाप्रभु ककवारा गांव पहुंचे, जिसे उस समय चक्रवरा ग्राम के नाम से जाना जाता था.
फगदोल में भगवान मधुसूदन और महाप्रभु की स्मृति का संगम
मंदार के पूरब स्थित फगदोल मंदिर की धार्मिक महत्ता भगवान मधुसूदन की परंपरा से भी गहराई से जुड़ी है. मकर संक्रांति के अवसर पर भगवान मधुसूदन आकर्षक रथ पर सवार होकर श्रद्धालुओं के साथ मंदार पहुंचते हैं. बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान के साथ यात्रा करते हुए फगदोल पहुंचते हैं, जहां पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं.
इसी धार्मिक परिसर के सामने स्थित चैतन्य महाप्रभु के चरणचिह्न श्रद्धालुओं के लिए आस्था का अलग केंद्र हैं. भगवान मधुसूदन के दर्शन और मंदार की परिक्रमा के लिए आने वाले गौड़ीय संप्रदाय के श्रद्धालु इन चरणचिह्नों के दर्शन और पूजा को विशेष महत्व देते हैं. प्रत्येक वर्ष इस्कॉन से जुड़े श्रद्धालु भी यहां पहुंचकर चरणपादुका की पूजा करते हैं.
बौंसी में भी दिखती है गौरांग की भक्ति परंपरा
चैतन्य महाप्रभु की भक्ति परंपरा की झलक बौंसी स्थित महात्मा भोली बाबा आश्रम में भी दिखाई देती है. आश्रम में नीम की लकड़ी से निर्मित गौरांग महाप्रभु और निताई गौर की नृत्य-भजन भाव वाली युगल प्रतिमा स्थापित है. आश्रम के शिष्य प्रतिदिन विधिवत पूजा-अर्चना और आरती करते हैं.
मंदार में साथ-साथ दिखती हैं कई साधना परंपराएं
मंदार की खासियत यह है कि यहां पौराणिक कथाओं के साथ अलग-अलग भक्ति, साधना और आध्यात्मिक परंपराओं की स्मृतियां भी साथ-साथ दिखाई देती हैं. चैतन्य महाप्रभु के चरणचिह्न इस विरासत को एक अलग आध्यात्मिक पहचान देते हैं.
वहीं वाममार्गी तंत्र साधकों और नाथ संप्रदाय के योगियों के प्राचीन श्रीनाथजी मंदिर पहुंचने की परंपरा मंदार की बहुआयामी साधना संस्कृति की ओर भी संकेत करती है.
मंदार मेले के दौरान इन स्थलों का आकर्षण और बढ़ जाता है. देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले श्रद्धालु जहां समुद्र मंथन से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं और मंदार पर्वत की धार्मिक महत्ता को महसूस करते हैं, वहीं चैतन्य महाप्रभु की भक्ति यात्रा से जुड़े स्थल उन्हें इतिहास, आस्था और भक्ति की उस कड़ी से जोड़ते हैं, जिसकी स्मृतियां पांच शताब्दियों बाद भी मंदार की धरती पर जीवंत हैं.
