बेलहर : थाना क्षेत्र में उग्रवाद व नक्सल संगठन की कमान जिसे भी सौंपी गयी उसने क्षेत्र में अपने वर्चस्व से सरकार व पुलिस को काफी परेशान किया चाहे वह दामोदर यादव हो या मंटू खैरा. इसके नाम से ही आम जनता क्या पुलिस को भी काफी सोच समझकर इसके विरुद्ध कार्रवाई करनी पड़ती थी. दामोदर यादव संगठन के बदलते स्वरूप का काफी खूंखार चेहरा रहा. जिसके नाम से दक्षिणी क्षेत्र में लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते थे, लेकिन उसके आतंक से उसके गांव के ही लोगों ने उसकी हत्या कर दी.
गोविंद को पकड़ने के िलए पुिलस को करनी पड़ी थी मशक्कत: इसके बाद संगठन का कमान बाल गोविंद यादव के हाथों में गयी. बेला की पहाड़ियों व जंगली एरिया में बाल गोविंद यादव के घोड़े की टाप से दूर-दूर तक के लोगों को उसकी मौजूदगी का एहसास हो जाता था.
उसे पकड़ने के लिए भी पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी लेकिन वह पुलिस के हाथ कभी नहीं लगा. उसके लिए अर्धसैनिक बल की विशेष टीम को लगाया गया. बाल गोविंद यादव काफी देर तक लड़ाई के बाद पकड़ा गया था. इस लड़ाई में बाल गोविंद यादव गंभीर रूप से जख्मी हो गया था. जिसके कारण उसकी मौत जेल में ही हो गयी थी. कुछ दिन तक बैजू यादव के आतंक से क्षेत्र थर्राता रहा. सीआरपीएफ के द्वारा उसकी गिरफ्तारी करने के बाद उसके जीवन में कुछ बदलाव आये. जेल से छूटने के बाद उसकी हत्या हो गयी.
इसी क्रम में तब तक तेलियाकुमरी पंचायत के बगधसवा गांव का बीरबल मुर्मू संगठन में काफी बड़ा ओहदा प्राप्त कर चुका था. जिसके खौफ से बांका जिला ही नहीं बल्कि जमुई, मुंगेर, भागलपुर व झारखंड के भी कुछ जिला थर्रा उठता था. आखिरकार उसे भी पुलिस ने पाकुड़ रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. इसके बाद मंटू खैरा ने कमान संभाली.
वह शातिर था वह लगभग एक दशक तक पुलिस को चकमा देकर जिले में कई घटना को काफी चालाकी से अंजाम देकर पुलिस को खुली चुनौती देता रहा. आखिरकार उसका भी अंत पुलिस मुठभेड़ में मौत के साथ होते ही नक्सल के एक और अध्याय का अंत होता दिख रहा है. लेकिन नक्सल व उग्रवाद रक्तबीज की तरह पूरे क्षेत्र में फैला हुआ है. एक कमांडर की मौत के बाद दूसरे का उदय काफी भयावह होता है.
