उदासीनता. नैयासी गांव के बच्चों का नया साल क्या?
फुल्लीडुमर प्रखंड मुख्यालय से महज दो किलोमीटर की दूरी पर बसा नैयासी गांव विकास की किरण से काफी दूर है. यहां के बच्चों के तन पर कपड़े नहीं है. दो-दो दिन के बने भोजन से यहां के लोग अपने पेट पालने को विवश है.
फुल्लीडुमर : 21 वीं सदी को जहां हम पार कर रहे है. डीजिटल करेंसी की बात जब हम आरंभ कर उस युग में प्रवेश करने को तैयार है वैसे में प्रखंड क्षेत्र से महज दो किलोमीटर की दूरी पर बसा नैयासी गांव विकास की किरण से काफी दूर है. यहां के बच्चों के तन पर कपड़े नहीं है. महिलाओं के कपड़े कई जगह से तार तार रहते है. दो-दो दिन के बने भोजन से यहां के लोग अपने पेट पालने को विवश है. ऐसे में प्रखंड के विकास पदाधिकारी, जनप्रतिनिधि के दावे पर तरस आता है कि आखिर वह गांव विकास की रफतार क्यों नहीं पकड़ी है. यहां के लोगों के रहमोकरम से दूसरे के घर जगमगाते है लेकिन उनका घर अंधेरा ही है.
बच्चों के तन पर नहीं हैं कपड़े
गांव की तस्वीर तथा बच्चे .
वर्षों से रहते हैं लैय्या जाति के लोग
प्रखंड मुख्यालय से महज दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित नैयासी गांव में करीब पचास घर लैय्या जाती के है. यह लोग मजदूरी कर अपने परिवार का भरण पोषण करते है. इस गांव से शिक्षा कोशों दूर है. यहां पर पहुंचने के लिए ना तो सड़क है और ना ही पीने की पानी के लिए चापाकल. अंधेरे में रात गुजारने के लिए लोग मजबूर है. इंदिरा आवास सहित अन्य सरकारी योजना इस गांव के लिए शायद नहीं बनायी गयी है.
क्या कहते है लोग
गांव के राजेश खैरा, शंकर खैरा, जलील खैरा, वृहस्पति खैरा, उमा खैरा, पुरन खैरा, पुरन तांती, योगेंद्र राय, पेचन खैरा, हुको खैरा, एतवारी खैरा आदि ने बताया कि चुनाव के वक्त यहां पर कई नेता पहुंचते है. बड़ी बड़ी गाड़ी किसी तरह उनके गांव पहुंच ही जाती है. यहां पहुंच कर लुभानी बाते बोल कर चले जाते है. लेकिन उसके बाद से एक भी गाड़ी नहीं आती है. अगर कोई यहां पर बीमार हो जाये तो यहां पर एंबुलेंस भी नहीं आती है. खाट व गोद में लेकर अस्पताल पहुंचते है. आंगनबाड़ी यहां पर नहीं है. पूरे गांव में एक चापाकल है वह भी सरकारी नहीं है. पीने के पानी के लिए कोशो दूर जाना होता है. मुखिया भी किसी प्रकार का लाभ नहीं देते है.
