आखिर कार्रवाई का एकमात्र विकल्प एफआईआर क्यों?

बांका जिले की सरकारी योजनाओं में मचा हैं लूट का तांडव कार्यकारी एजेंसियों पर ताबड़तोड़ एफआईआर के आदेश से हो रही पुष्टि क्रियान्वयन के दौर में निरीक्षी पदाधिकारी की सुस्ती से बिगड़ रहा माहौल नियमित जांच व निगरानी से ही रूक सकती है योजनाओं में गड़बड़ी पर कार्रवाई से मुक्त हो बेफिक्र बने हुए हैं […]

बांका जिले की सरकारी योजनाओं में मचा हैं लूट का तांडव

कार्यकारी एजेंसियों पर ताबड़तोड़ एफआईआर के आदेश से हो रही पुष्टि
क्रियान्वयन के दौर में निरीक्षी पदाधिकारी की सुस्ती से बिगड़ रहा माहौल
नियमित जांच व निगरानी से ही रूक सकती है योजनाओं में गड़बड़ी
पर कार्रवाई से मुक्त हो बेफिक्र बने हुए हैं निरीक्षी पदाधिकारी
बांका : बांका जिले में सरकारी योजनाएं जैसे लूट के लिए ही हैं. जिले की प्राय: तमाम सरकारी योजनाओं में वित्तीय गड़बड़ी, घोटाला और लूट का तांडव मचा हुआ है. आलाधिकारी बैठकें आयोजित करते है… योजनाओं की समीक्षा होती है… बड़े अधिकारी स्थिति से असंतुष्ट होते है… और इन सब के बाद उनके समक्ष मानो एक ही विकल्प होता है एफआईआर. लेकिन क्या हर गड़बड़ी और समस्या का निराकरण अंतत: एफआईआर ही हो?
और सवाल यह भी है कि किसी योजना के क्रियान्वयन की प्रक्रिया में प्लानिंग से लेकर उसके पूरा होने तक कई चरण होते है. लेकिन इन चरणों को पार कर उनके पूरा होने तक सिर्फ एफआईआर की ही परिस्थितियां क्यों उत्पन्न होने दी जाती है?
किसी भी निर्माण, वित्तीय या लाभकारी योजना के क्रियान्वयन की एक स्पष्ट प्रक्रिया होती है.
योजना पास होती है. प्राक्कलन बनता है. समीक्षा होती है. अनुमोदन होता है. प्रशासनिक स्वीकृति मिलती है. कार्यादेश के बाद काम आरंभ होता है. प्रत्येक काम के लिए एक मापी पुस्तिका होती है. काम आगे बढ़ता चला जाता है. कागजी प्रक्रिया भी साथ-साथ चलती है.
प्रत्येक योजना के क्रियान्वयन के दौर में स्थल जांच, निरीक्षण एवं समीक्षा के भी प्रावधान हैं. इसके लिए अधिकार संपन्न अधिकारी नियुक्त होते हैं. लेकिन बात जब किसी काम में गड़बड़ी, घोटाले और घपले के बाद एफआईआर तक पहुंचती है तब सहज ही एक सवाल उठता है कि इस पूरे दौर में संबंधित जिम्मेदार अधिकारी क्या कर रहे थे और कि उन्होंने किस तरह अपनी ड्यूटी निभायी? गड़बड़ी या घपले का ठीकरा किसी एक या दो पर ही क्यों? अगर कार्यारंभ के बाद योजना की पूर्णत: तक उनकी निगरानी भी साथ – साथ चले और पूरी जिम्मेवारी से चले तो फिर एफआईआर की परिस्थितियां ही पैदा ना हों.
योजनाओं के क्रियान्वयन में गड़बड़ी, घपले और अनियमितता को लेकर बांका जिले में इधर प्राथमिकी और तत्पश्चात उनमें पुलिस की दखलंदाजी के मामले की तीव्रता बेहिसाब बढ़ी है. गत 6 फरवरी को शिक्षा विभाग की एक बैठक में योजनाओं में गड़बड़ी के कई मामले उजागर हुए. डीएम ने भी इनमें ताबड़तोड़ प्राथमिकी के आदेश दिये.
विद्यालय भवनों एवं उनमें शौचालयों के निर्माण की प्रगति की समीक्षा के दौरान डीएम ने आधे दर्जन मामलों में ऐसे आदेश दिये. इनमें निकाली गयी राशि के अनुरूप भवन एवं शौचालय निर्माण नहीं करने के मामले शामिल है. ये तो बस एक उदाहरण है. ऐसे मामले अक्सर जिले में सामने आ रहे हैं. उस पर तूर्रा यह कि जो मामले पकड़े गये उनमें तो एफआईआर लेकिन जो मामले पकड़े नहीं गये या संबद्ध संवेदक और अधिकारी मैनेज कर पाने में सफल रहे उनकी पौ बारह.

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