जमाने के साथ बदल गयी बौंसी मेले की तस्वीर तस्वीर: 16 बांका- संबंधित तस्वीर लगा सकते हैं.- बुजुर्गों को याद आता है अपने बचपन के जमाने का बौंसी मेला- तब मेला देखने नहीं, मेला जीने जाते थे लोग मंदार व बौंसी मनोज उपाध्याय, बांका जो तबका आज बुजुर्ग हो चुका है उन्हें अपना बचपन याद है और उस दौर का बौंसी मेला भी. वे आहें भरते हुए तब के बौंसी मेले को याद करते हैं… ओह , क्या दौर था तब! बैलगाड़ी, टमटम, साइकिल और फिर भमरागाड़ी(बड़ा टेंपो)… उन पर लदे रंग बिरंगे वस्त्रों में झिलमिलाते लोग… बच्चों की किलकारियां… हर तरफ पों..पां.. तड़बड़-तड़बड़ और बांसुरी की सुरीली धुन… ओह.. क्या बात थी..! बौंसी मेला तब मेला होता था. यह मेला नहीं, समेकित लोक संस्कृति का प्राकट्य था. लोग मेला देखने नहीं, मेला जीने को मंदार,पापहरणी और बौंसी मेला पहुंचते थे.मकर संक्रांति के अवसर पर लगने वाले इस मेले की दो सप्ताह पूर्व से ही तैयारियां शुरु हो जाती थीं. मेला के ईद-गिर्द दस कोस के दायरे में मकर संक्रांति के साथ-साथ बौंसी मेले के लिए भी अलग से लड़ूआ-चूड़ा आदि का इंतजाम होता था. गुड़-तिल और सीसवा गोलनी की मीठी महक फिजां में घुल जाती थी. कौन किसके साथ और किस सवारी से कितने दिनों के लिए मेला जायेगा, इस पर पहले से चर्चाएं होती थीं. कपड़े, बिछावन, कंबल आदि साफ कर लिये जाते थे. मेला में ठहरने की जगह का भी निश्चय होता था. और अंतत: आता था मकर संक्रांति का पवित्र त्योहार जिसके एक रोज पहले ही नर -नारी और बच्चों का हुजूम पापहरणी और बौंसी मेले के लिए उमड़ा पड़ता था.बैलगाड़ी, टमटम, साइकिल और उस वक्त प्रचलित बड़ी टैंपो जिसे तब भमरा गाड़ी भी कहते थे. उनकी सवारी होती थी. आसपास के दस-पांच किमी के दायरे से लोग तो पांव पैदल ही मेला और पापहरणी पहुंचते थे. साथ खाने-पीने और ओढ़ने-बिछाने के समान सहित आग तापने के लिए लकडि़यां भी ले जाते थे. तब ज्यादातर सड़कें कच्ची थीं. बौंसी और मंदार से जुड़ने वाली भूरना, हरला रोड, डैम रोड, भंडारीचक, सबलपुर, चिलमिल, तप्पाडीह आदि सड़कों पर बैलगाडि़यों और साइकिलों का काफिला होता था. ढाकामोड़ बौंसी रोड तथा श्याम बाजार बौंसी रोड पर टमटम, साइकिल, टैंपु आदि की कतारें होती थीं. तब मेला देखने की तरह मेला और पापहरणी तक पहुंचने का भी अपना एक अलग उत्साह और आनंद था. तब मेले में खरीद-बिक्री की भी एक अलग संस्कृति थी. लोग घरेलू व कृषि उपयोगी सामग्रियां एवं उपकरण मेले में खरीदते थे. इनमें गोड़ी वाली डिबिया, काठ व लोहे का बक्सा, लोहे की कड़ाही, सिलपाटी, ईश, जुआठ, फर्नीचर एवं दरवाजे आदि प्रमुख होते थे. खिलौनों में बांसुरी, तड़बडि़या आदि मुख्य थे. मेला तब भी रात में जमता था. दिन में सर्कस तो रात में थियेटर का जलवा होता था. बजरंग थियेटर जैसी कंपनियां यहां आती थीं जिनमें धार्मिक एवं ऐतिहासिक प्रसंगों पर नाटक पेश किये जाते थे. इन कार्यक्रमों में शालीनता होती थी. अब दौर बदल चुका है.आधुनिकता के नाम पर भौंडेपन और अश्लीलता का बोलबाला कायम हो गया है. मेले में अब न उस तरह के सर्कस आते हैं न थियेटर कंपनी. खरीद- बिक्री की संस्कृति भी बदल गयी है. लड़ुआ की जगह फास्ट फूड ने ले ली है. बच्चे पारंपरिक खिलौने की जगह प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक खिलौने पसंद करते हैं. मेले में अश्लील गीतों की कर्णभेदी आवाज गूंजती है, असुरक्षा का भाव अलग है. कुल मिलाकर मेला औपचारिक बन कर रह गया है. ————-
जमाने के साथ बदल गयी बौंसी मेले की तस्वीर
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