Aurangabad News : मनुष्य को जीवन जीने की कला सिखाता है श्रीमद्भागवत कथा

Aurangabad News: बिराज बिगहा में ज्ञान यज्ञ के आयोजन से माहौल भक्तिमय

अंबा.

श्रीमद्भागवत कथा मनुष्य को जीवन जीने की कला सिखाती है. ये बातें मोक्ष धाम गया के संत चक्रपाणि जी महाराज ने कही. वे सोमवार की रात प्रखंड क्षेत्र के बिराज बिगहा गांव में श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दौरान प्रवचन कर रहे थे. उन्होंने कहा कि व्यक्ति के अपने कर्मों का फल निश्चित रूप से भुगतना पड़ता है. गौकर्ण और धुधंकारी दोनों अपने सगे भाई थे, पर दोनों के स्वभाव में काफी अंतर था. गोकर्ण बड़ा होकर विद्वान पंडित व ज्ञानी निकला. वहीं धुंधकारी नशेड़ी, क्रोधी,व्यभिचारी अस्त-शस्त्र धारण करने वाला दुष्ट स्वभाव का निकला. धुंधकारी बड़े होकर अपने माता-पिता को सताने लगता है. यहां तक अपने पिता आत्मदेव को मारपीट कर घर से निकाल दिया. इधर गोकर्ण ने भी अपने भाई के व्यवहार से काफी दुखित रहता था. उसने अपने पिता आत्मदेव को वैराग्य धारण करने का उपदेश दिया. आत्मदेव के तपस्या के लिए निकल जाने पर उनकी पत्नी धुंधली कुएं में कुदकर आत्महत्या कर लेती है. इसके बाद धुंधकारी वेश्याओं के साथ रहने लगता है और उन्हीं के लिए धन जुटाता है. अंत में उसकी भी मृत्यु हो जाती है.मरने के बाद धुंधकारी प्रेतयोनी धारण करता है. पूर्व के कर्मों के फल के चलते प्रेतयोनी में भी वह वर्षों तक भटकता रहा. गोकर्ण द्वारा गया श्राद्ध कराने के बाद भी उसकी आत्मा को शांति नहीं मिलती है.इधर प्रेतयोनी में धुधंकारी को अपने पूर्व के कर्मों के प्रति पछतावा हुआ. इसके बाद गोकर्ण ने सूर्यदेव से राय लेकर उसे श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण कराया. श्रीमद्भागवत कथा सुनकर धुधंकारी का मन निर्मल हो गया और उसे प्रेम योनी से उसकी मुक्ति मिली. उन्होंने कहा कि शराब पीने वाला, माता पिता को कष्ट देने वाला शराब पीने वाला वैश्यागामी व व्यभिचारी आदि तरह के व्यक्ति को प्रेतयोनी में भी भटकते पड़ता है. उन्होंने कहा कि अब न कथा सुनाने वाला गौकर्ण है और न कथा सुनने वाला धुधंकारी है. मनुष्य को अपने कर्मों से विचलित नहीं होना चाहिए.

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By Prabhat Khabar News Desk

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