बनेगा नया समीकरण !

– सुधीर कुमार सिन्हा – राजद-कांग्रेस के गंठबंधन से सियासी तसवीर बदलने के संकेत औरंगाबाद (कोर्ट) : लालटेन जलाने को मिले हाथ, तो इसकी रोशनी कहीं-न-कहीं उजाला तो फैलायेगी ही. पूरे बिहार में राजद व कांग्रेस का नया समीकरण कोई गुल खिलाये या नहीं, पर जिले में 2014 के लोकसभा चुनाव में तो ये समीकरण […]

– सुधीर कुमार सिन्हा –

राजद-कांग्रेस के गंठबंधन से सियासी तसवीर बदलने के संकेत

औरंगाबाद (कोर्ट) : लालटेन जलाने को मिले हाथ, तो इसकी रोशनी कहीं-न-कहीं उजाला तो फैलायेगी ही. पूरे बिहार में राजद व कांग्रेस का नया समीकरण कोई गुल खिलाये या नहीं, पर जिले में 2014 के लोकसभा चुनाव में तो ये समीकरण काफी कुछ राजनीतिक उथल-पुथल करवा सकता है. पूर्व के लोकसभा चुनावों में औरंगाबाद जिला राजद-कांग्रेस के तालमेल से मिले परिणाम का गवाह रह चुका है.

राजद-कांग्रेस के तालमेल में 1999 व 2004 की लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद श्यामा सिंह और निखिल कुमार संसद का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. एक बार फिर इन दोनों पार्टियों के बीच नया समीकरण बना है, जो जिले की सियासी गलियारों की सीन बदल सकता है. इसके मुख्य वजह हैं-राजद-कांग्रेस का गंठबंधन और निखिल फैक्टर.

कहते हैं विपक्षी

भारतीय जनता पार्टी के जिलाध्यक्ष पुरुषोत्तम सिंह का कहना है कि अब मतदाताओं को बरगलाना आसान नहीं है. जहां तक राजद-कांग्रेस अपने गंठबंधन की बात है, तो इससे इन्हें कोई विशेष फायदा नहीं होनेवाला है. राजद मुसलिम मत को अपना आधार मान कर चल रहा है, लेकिन मुसलिम कोई बच्चे नहीं हैं, जो असलियत नहीं जानते और उन्हें आसानी से फुसलाया जा सकता है. कांग्रेस का औरंगाबाद में कोई जनाधार नहीं है. सवर्ण, दलित और मुसलिम का उसका आधार कब का दरक गया है.

क्या है निखिल फैक्टर

औरंगाबाद जिला केरल के पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार का पुश्तैनी कार्यक्षेत्र रहा है. उनके दादा बिहार विभूति अनुग्रह नारायण सिंह बिहार के पहले उपमुख्यमंत्री थे. उनके पिता सत्येंद्र नारायण सिन्हा बिहार के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं. इसके अलावा उनकी पत्नी श्यामा सिंह और स्वयं निखिल कुमार भी औरंगाबाद का संसद में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. इतने लंबे समय तक जिले की राजनीति में केंद्रीय भूमिका निभाने के कारण मतदाताओं खासकर-राजपूत मतदाताओं का एक विशेष भावनात्मक लगाव इस परिवार के साथ हैं.

वर्ष 1999 व 2004 में राजद व कांग्रेस के तालमेल के दौरान संसद बने थे. पर, पिछले संसदीय चुनाव में राजद और कांग्रेस अलग-अलग चुनाव लड़े थे. उस समय भी यह तय माना जा रहा था कि कांग्रेस का जनाधार बेहद कम है और राजद का समर्थन हटने से कोई बड़ी जाति समुदाय का साथ नहीं था. इसके बाद कांग्रेस जीती तो नहीं, लेकिन लगभग 54 हजार मत आये थे. ये मत निखिल कुमार के व्यक्तिगत प्रभाव से ही आये थे.

2009 के लोकसभा चुनाव में औरंगाबाद संसदीय सीट से राजद ने शकील अहमद खान और भाजपा व जदयू के गंठबंधन में सुशील कुमार सिंह चुनाव लड़े थे. इसमें सुशील कुमार सिंह ने जीत दर्ज की थी. अब फिर से यदि राजद के समर्थन में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में निखिल कु मार चुनावी समर में उतरते हैं, तो यह तय है कि उनके समुदाय और उनके परिवार से भावनात्मक लगाव रखने वाला एक बड़ा तबका इस गंठबंधन के समर्थन में मतदान करेगा, जिसका लाभ गंठबंधन को होगा.

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