समाजहित के ध्येय ने दिखाया बेहतर रास्ता, मिली मंजिल
अंबा (औरंगाबाद) : निशुनपुर गांव के एक समान्य घर की महिला हैं कुमारी सावित्री सिंह. मूलत: हाउस वाइफ ही हैं. पर, अपनी इच्छाशक्ति के बूते वह गांव के बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिए समय भी निकालती रही हैं. स्थानीय राजनीति में भी दिलचस्पी है उनकी. पढ़ाने-लिखाने के जरिये बच्चों व उनके अभिभावकों के साथ उनके […]
अंबा (औरंगाबाद) : निशुनपुर गांव के एक समान्य घर की महिला हैं कुमारी सावित्री सिंह. मूलत: हाउस वाइफ ही हैं. पर, अपनी इच्छाशक्ति के बूते वह गांव के बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिए समय भी निकालती रही हैं. स्थानीय राजनीति में भी दिलचस्पी है उनकी. पढ़ाने-लिखाने के जरिये बच्चों व उनके अभिभावकों के साथ उनके संपर्क और राजनीति में दिलचस्पी की बदौलत उन्हें एक नया मुकाम भी हासिल हो गया है. वह अपनी कुटुंबा पंचायत की मुखिया भी हो गयी हैं. किसी व्यक्ति विशेष के आशीर्वाद से नहीं,
बल्कि चुनाव लड़ कर चुनाव जीती हैं. जनता के समर्थन से. सावित्री कहती हैं, ‘मैं कोई रबर स्टांप मुखिया नहीं हूं. अपने कामकाज स्वयं जानती-समझती हूं और खुद ही करती-कराती भी हूं. इसके लिए घर के लोगों से अलग से कोई सहयोग नहीं लेती.’ सावित्री के इस दावे का समर्थन इलाके में उन्हें जाननेवाले दूसरे लोग भी करते हैं. वे मानते हैं कि सावित्री अपनी ही तरह की दूसरी ढेर सारी महिला मुखिया से काफी अलग हैं.
सावित्री के बारे में पता चलता है कि जब उनकी शादी हुई थी, तब उनके पति विनोद कुमार वार्ड सदस्य का चुनाव जीते थे. उपमुखिया भी बन गये थे. इस वजह से सावित्री के घर पर राजनीति में दिलचस्पी लेनेवालों का आना-जाना लगा रहता था. इससे सावित्री को गांव व पंचायत के पड़ोसी गांवों को समझने में काफी सहूलियत हुई. वह स्थानीय राजनीति के ट्विस्ट एंड टर्न्स को समझने लगी थीं. पर, उनके लिए यह संभव नहीं था कि वह सीधे मुखिया के चुनाव में कूद पड़ें. सीधे मैदान में जाकर ताल ठोंके. इसलिए उन्होंने सबसे पहले अपनी सामाजिक छवि को बदलना शुरू किया. चूंकि वह पढ़ी-लिखी महिला थीं, उन्होंने अपने गांव व पास-पड़ोस के बच्चों को पढ़ाने में रुचि दिखायी. बच्चे उनके यहां पढ़ने के लिए आने लगे. धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी. बच्चों के बहाने उनके अभिभावकों के साथ भी सावित्री का संपर्क मजबूत हुआ. एक-दूसरे को समझने का उन्हें बेहतर अवसर मिलने लगा. पर, इसी बीच उनके पति विनोद ने अपने को राजनीति से अलग कर लिया. वह अपने कारोबार में फिर से रम गये. लेकिन, एक और डेवलपमेंट हो गया. पिछली बार उनकी पंचायत में मुखिया पद को सामान्य महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिया गया. चूंकि गांव के लोग इस बात से आश्वस्त थे कि सावित्री को स्थानीय राजनीति की समझ हो गयी है और वह पढ़ी-लिखी भी हैं, इसलिए बड़ी संख्या में गांव के लोगों ने उन्हें मुखिया पद के लिए चुनाव के मैदान में उतरने को प्रेरित किया. अंतत: उन्होंने गांववालों की इच्छा का सम्मान करते हुए चुनाव लड़ने का मन बनाया और अपनी उम्मीदवारी जता दीं. चुनाव हुआ, तो नतीजा भी उनके पक्ष में गया. वह मुखिया चुन भी ली गयीं. वह मानती हैं कि समाजहित में गांव के बच्चों को पढ़ाने के उनके फैसले ने उनके भविष्य को एक नयी राह पर आगे बढ़ने को प्रेरित किया. वह घर-आंगन और चूल्हे-चौके से चल कर राजनीति की दुनिया में पहुंच गयीं.
सावित्री का कहना है कि वह अपनी पंचायत को बिल्कुल अलग ढंग से सजाना-संवारना चाहती हैं. उनकी इच्छा है कि उनके गांव की कोई भी सड़क कच्ची न रह जाये. हर घर में शौचालय तो हो ही, रात के अंधेरे से निजात पाने के लिए रोशनी की भी पर्याप्त व्यवस्था उनकी चिंता का हिस्सा है. इसके साथ ही वह चाहती हैं कि किसी भी कारण गांव या पंचायत का कोई बच्चा स्कूल जाने से वंचित न रह जाये, इसकी गारंटी भी हो.
घरवालों की दखल नहीं, खुद लेती हैं तमाम फैसले
आमतौर पर देखा जाता है कि किसी महिला के जनप्रतिनिधि चुने जाने पर उसके पति या अन्य परिजन ही उसका कार्यभार संभालते हैं. निर्वाचित महिला रबर स्टांप की तरह काम कर रही होती है. तमाम फैैसले उसकी जगह घरवाले ही कर लिया करते हैं. लेकिन, कुटुंबा की इस महिला मुखिया सावित्री कुमारी के साथ ऐसा नहीं है. वह अपनी पंचायत के तमाम कामकाज खुद ही देखती हैं. वह कहती हैं, ‘मैं अपने कामकाज से संबंधित सभी फैसले खुद ही लेती हूं. बिल्कुल पूरी आजादी के साथ. घर-परिवार से किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता. ऐसे काम करने का एक अलग सुख है. स्वावलंबन का एहसास होता है, एक अलग तरह की सुखद अनुभूति होती है.’
अभी जारी है सावित्री की पढ़ाई भी : विज्ञान से स्नातक तक की पढ़ाई करने के बाद विवाह व राजनीति में सावित्री का पदार्पण हुआ था. वह अपने अधिकार व कर्तव्यों को भलीभांति समझती हैं. जनता के तमाम कामकाज के लिए हमेंशा प्रस्तुत रहती हैं. इसके साथ ही घर के लिए भी अलग से समय निकाल लेती हैं. घर-परिवार को समय की जरूत है, इस बात का भी उन्हें पूरा ध्यान रहता है. वह कहती हैं, ‘ऐसा नहीं कि पंचायत की कमान संभालने के बाद मैंने अपने घर का कामकाज छोड़ दिया हो. घर के सारे काम भी खुद ही निबटा लेती हूं. इसके साथ-साथ पढ़ाई में भी मेरी रुचि है.’ सावित्री की पढ़ाई अब भी चल रही है. फिलहाल वह इग्नू से इतिहास विषय में एमए की पढ़ाई भी कर रही हैं. इलाके के अनाथ व असहाय बच्चियों को नि:शुल्क पढ़ने का अवसर मिले, इसके लिए सावित्री प्रयासरत हैं. गरीब बच्चों को स्कूलों से जोड़ने के लिए बड़े पैमाने पर कोशिश कर रही हैं.