अनदेखी. नगर पर्षद व जिला प्रशासन की लापरवाही से शहर बेहाल
औरंगाबाद (सदर) : औरंगाबाद शहर में अब अलग-अलग प्रांत से लोग आते हैं. कोई व्यवसाय के लिए, तो कोई देव दर्शन के लिए. इसके अलावा लोग अपने परिजन व मित्रों से मिलने तो आते ही रहते हैं. शहर से 13 किलोमीटर की दूरी पर रेलवे स्टेशन व महज दो किलोमीटर पर बस स्टैंड.
यात्रियों के लिए यहां शहर में अच्छे व आरामदायक होटल भी हैं. अब तो एक मॉल भी शहर की खूबसूरती में शामिल हो गया है. लेकिन, ये सब शहर की खूबसूरती को तब बढ़ाता है, जब शहर का प्रवेश द्वार आकर्षक होता. पर, यहां तो शहर में कदम रखते ही विभिन्न समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है. यहां आने वाले लोगों की नजरें खूबसूरती को बाद में देखती हैं, पहले शहर की कुव्यवस्था पर ही नजर जाती है. शहर की कुव्यवस्था बाइपास ओवरब्रिज व रमेश चौक से ही दिखने लग जाती है.
अतिक्रमण है बड़ी बाधा
अतिक्रमण की समस्या यहां गंभीर है, जिसे हटाने के प्रयास में जिला प्रशासन कई बार मात खा चुका है. यहां के अतिक्रमणकारी नगर पर्षद को टैक्स न देकर विभिन्न संघों को चंदा देते हैं, जो इनकी अस्थायी दुकान चलाने की लड़ाई लड़ते हैं.
रमेश चौक से ऐसे अस्थायी दुकानें शुरू हो जाती हैं, जो शहर की सड़कों पर अतिक्रमण किये हुए हैं. शहर का सब्जी मार्केंट अतिक्रमण का एक बड़ा रूप है, जो शहर की सुंदरता को प्रभावित करता है. हालांकि, इसके लिए नगर पर्षद ने स्थायी रूप से व्यवस्था बनायी, पर फुटपाथियों को पसंद नहीं आ रहा.
आवारा पशु व गंदगी भी है गंभीर समस्या
शहर के सड़क पर आवारा पशु बैठे या घूमते ऐसे मिल जायेंगे, जैसे कोई चिड़ियाघर हो. बड़े सीधे-साधे अावारा जानवर ये किसी को मारते नहीं, बल्कि हर रोज खुद मार खाते हैं.
कभी सब्जी वालों से, तो कभी ठेले वालों से. कभी-कभी जब दुकानदारों द्वारा पशुओं की पिटाई की जाती है, तो वह पिटाई से बचने के लिए बेतहाशा सड़क की ओर भाग खड़े होते है, जिससे हर दिन दुर्घटनाएं होती हैं. इसके अलावा गंदगी व कचरे का ढेर भी मुसीबत बनता है. रमेश चौक, कोर्ट, पोस्टऑफिस गेट व धर्मशाला चौक पर कई स्थान ऐसे हैं, जिसे लोगों ने पेशाबघर में तब्दील कर दिये हैं.
सरकारी प्रक्रिया गिनाने लगते हैं पदाधिकारी
शहर की समस्या पर जब भी नगर पर्षद के कार्यपालक पदाधिकारी से बात की जाती है, तो वह सरकारी प्रक्रिया ही गिनाने लगते हैं. पेशाबघर के लिए उनसे बात करने पर जवाब मिलता है कि सरकारी जमीन के अभाव में पेशाबघर नहीं बन पा रहा है. वहीं, जनप्रतिनिधि भी पदाधिकारी के बयान को ही ढोते चलते हैं. शहर की सुंदरता के लिए प्रयास नहीं किये जाने भर से कुव्यवस्था बनी हुई है. अगर, पदाधिकारी व जनप्रतिनिधि दोनों मिल कर योजना बनायें, तो शहर का मुख्य द्वार क्या, पूरा शहर सुंदर हो सकता है.
ऑटोचालकों की हरकतें देखने लायक
स्टेशन व स्टैंड से उतर कर अपने-अपने गंतव्य की ओर निकलने वाले लोगों को गाड़ियों में बैठाने के लिए ऑटो चालक की हरकतें देखने लायक होती हैं. यात्रियों को अपने ऑटो में बैठाने के लिए ये उनके सामान ऐसे छीनते हैं, जैसे छीना-झपटी कर रही हो. रमेश चौक पर ये नजारा आये दिन देखने को मिलता है. शहर में 500 से अधिक ऑटो चलानेवाले हैं.
पर, इनके लिए कोई रूट निर्धारित नहीं किये गये हैं. हालांकि, पूर्व अनुमंडल पदाधिकारी ने अपने स्तर से प्रयास कर ऑटो यूनियन संघ के साथ एक बैठक कर वार्ता भी की थी व इनका रूट निर्धारण करते हुए ड्रेस कोड भी लागू कराया था. लेकिन, ये व्यवस्था उनके जाने ही साथ चली गयी. अब न तो शहर में कोई नियम से ऑटो चलते हैं और न ही चालक ड्रेस में दिखते हैं. शहर में जाम की समस्या ज्यादातर ऑटो के कारण ही उत्पन्न होती है. नाबालिगों द्वारा ऑटो ऐसे चलाया जाता है, जैसे वह साइकिल चला रहे हो.
