अनदेखी. शहर के कई मुहल्लों में कोचिंग सेंटरों की भरमार
औरंगाबाद शहर समेत पूरे जिले में कोचिंग सेंटरों की भरमार है. इन कोचिंग सेंटरों को चलानेवाले सरकारी नियम-कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं. एक-एक कमरों में क्षमता से अधिक स्टूडेंट्स बैठाये जा रहे हैं. इसके अलावा कई कोचिंग सेंटर बिना रजिस्ट्रेशन के ही चलाये जा रहे हैं.
औरंगाबाद (ग्रामीण) : औरंगाबाद शहर में घर, स्कूल, किराये के मकान व खुले मैदान में कोचिंग चल रहे हैं. पैसा कमाने के लिए कोचिंग चलानेवाले किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं. एक-एक कमरों में 100 से 150 विद्यार्थियों को बैठा कर शिक्षा दी जा रही है, जबकि उस कमरे में मुश्किल से 70 से 80 विद्यार्थी ही बैठ सकते हैं. इस गरमी के मौसम में कई कोचिंग सेंटरों में पंखे तक नहीं हैं, लेकिन उनकी फीस भी काफी अधिक है. फिर भी छात्र-छात्राओं का रुझान कोचिंग की तरफ है.
लॉज व किराये के मकान में कई पाबंदियां
मदनपुर प्रखंड के दक्षिणी इलाके के रहनेवाले अरुणजय इंजीनियरिंग परीक्षा की तैयारी के लिए जिला मुख्यालय स्थित एक लॉज में रहता है. रहने-खाने के लिए छह से सात हजार रुपये चुकाने पड़ते हैं. अरवल जिले का सुबोध भी उसके साथ ही रहता है. ऐसा कर दोनों कुछ पैसे बचाने की कोशिश करते हैं. हालांकि, लॉज उनके लिए मजबूरी बन गयी है.
लॉज का मालिक मनमानी करता है. लॉज में रहनेवाले छात्रों पर समय पर उपस्थित व अधिकसमय तक बिजली नहीं जलाने समेत कई तरह की पाबंदी लगायी गयी है. मंटू, मुकेश, अश्विनी व राजेश जैसे सैकड़ों छात्र-छात्राएं न्यू एरिया, बराटपुर, क्लब रोड, सिन्हा कॉलेज रोड, टिकरी मुहल्ला, ब्लॉक कालोनी व सत्येंद्रनगर आदि मुहल्ले में रहते हैं. क्योंकि, अधिकतर कोचिंग इन्हीं मुहल्लों में हैं. यहां बड़ी संख्या में विद्यार्थी किराये के मकान में भी रहते हैं, जहां उनसे मनमाना किराया वसूलने के साथ-साथ उन पर कई पाबंदियां भी लगायी जाती हैं.
कोचिंग की पढ़ाई के बल पर ही दे रहे परीक्षा
स्कूलों व कॉलेजों में हो रही पढ़ाई से भी बच्चे खुश नहीं है. कोचिंग की पढ़ाई की बदौलत अपना भविष्य बदलने में लगे हैं. ऐसे में शहर में चलनेवाले दर्जनों कोचिंग सेंटरों में छात्र-छात्राओं की संख्या की कमी नहीं है.
इनमें कई विद्यार्थी ऐसे हैं, जो सरकारी स्कूल-कॉलेजों की पढ़ाई के बजाय कोचिंग को ज्यादा तरजीह देते हैं. क्योंकि, अधिकतर सरकारी स्कूलों व कॉलेजों में शिक्षकों की कमी है. एक कोचिंग संस्थान में पढ़नेवाले राहुल कुमार, विवेक कुमार व कुंदन कुमार का कहना है कि सरकारी स्कूल-कॉलजों में शिक्षकों की कमी के कारण काेर्स पूरा नहीं हो पाता है. ऐसी स्थिति में कोचिंग की शरण लेनी पड़ती है.
बगैर रजिस्ट्रेशन के चल रहे कई कोचिंग
कोचिंग चलाने के लिए सरकार ने तीन साल पहले कई दिशा-निर्देश जारी किये गये थे. पटना में एक कोचिंग में हुए बवाल के बाद संचालकों द्वारा नियमों की दुहाई दी गयी थी. कोचिंग चलानेवालों को शिक्षा विभाग से रजिस्ट्रेशन कराने के बाद अपने मानकों को दरसाना था. उस वक्त यानी 2013-14 में रजिस्ट्रेशन कराने के लिए कई कोचिंग चलानेवाले तत्पर दिखे. इन्होंने एक संगठन भी बनाया, लेकिन सब बेकार साबित हुआ. शहर में अभी भी अधिकांश कोचिंग सेंटर बगैर रजिस्ट्रेशन के चल रहे हैं. जरूरत है जांच-पड़ताल की.
कोचिंग में शहरी इलाके से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थी अधिक आते हैं. समय से पढ़ाई कर अधिकतर अपने घर लौट जाते हैं. जो छात्र शहर में किराये के मकान में रहते हैं, वे समय के पाबंद होते हैं. हर विद्यार्थी चाहता है कि उसे बेहतर शिक्षा उपलब्ध हो, जिसे संबंधित संस्थान पूरा करे. कोचिंग संस्थान छात्र-छात्राओं के भविष्य के प्रति गंभीर हैं. यही कारण है कि कोचिंग के प्रति विद्यार्थियों का झुकाव है.
विकास कुमार, कोचिंग संचालक
चुनाव के बाद कोचिंग की होगी जांच
कोचिंग चलाने के लिए रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य है. चुनाव के बाद कोचिंग की जांच करायी जायेगी. जिनके पास रजिस्ट्रेशन नहीं होगा, उनके विरुद्ध कार्रवाई की जायेगी. कोचिंग सेंटरों को बंद भी करा दिया जायेगा.
विनोद कुमार सिन्हा, जिला शिक्षा पदाधिकारी, औरंगाबाद
