सुजीत कुमार सिंह
औरंगाबाद : कहते है संस्कार और संस्कृति सभ्य समाज के निर्माण में अहम भूमिका निभाती है. संस्कृति से देश की पहचान होती है तो संस्कार से समाज की. इसमें विरासत का भी कहीं न कहीं योगदान होता है. पंडा-पुजारी और साधु-संत को लेकर हमारे देश में आज बहस छिड़ी हुई है. चंद लालची संतों की करतूत से संत समाज बदनाम हो रहे हैं. यह मामला पिछले दिनों सुर्खियों में भी रहा है. फर्जी बाबाओं पर हाल में शिकंजा भी कसा गया है.
आज जरूरत है अपने संस्कार और संस्कृति को बनाये रखने की. औरंगाबाद शहर में 10 वर्ष से लेकर 14 वर्ष तक के कई किशोर संत भाग्य और विधाता के बारे में जानकारी देने निकल पड़े हैं. शनिवार को कुछ ऐसे ही बाल संतों से ‘प्रभात खबर’ ने कुछ जानकारियां प्राप्त की. नवीनगर के पंडा बाजार का निवासी बता रहे पुरुषोत्तम पंडित (10 वर्ष) और सुनील पंडित (12 वर्ष) से जब शहर के चितौड़ नगर मुहल्ले में मुलाकात हुई तो सबसे पहले उन दोनों ने 10 रुपये लेकर भविष्य की जानकारी देने की बात कही. हाथ में कैमरा देख कर पहले दोनों ने अपना चेहरा छुपा लिया, फिर कहा कि इसी उम्र में ज्ञान प्राप्त कर समाज सुधारने के लिए निकले हैं.
दोनों संत के हाथ में कमंडल और शनि महाराज के छोटी मूर्ति, पहनावे में धोती और कुर्ता, ललाट पर लगे चंदन व बंधे चूल देख कर कोई भी व्यक्ति संत की ही उम्मीद कर सकता है. दोनों बाल संतों ने 20 से 25 लोगों के हाथ देखा और उन्हें भविष्य की जानकारी दी. बाल संतों के जाने के बाद नवीनगर के पंडा मुहल्ला से जानकारी ली गयी तो पता चला कि वहां ऐसा कोई मुहल्ला है ही नहीं. यह मामला दिन के नौ बजे की है. डेढ़ घंटे बाद फिर दोनों बाबाओं से रामाबांध बस स्टैंड पर मुलाकात हो गयी.
पहले तो दोनों ने कहा कि बदनामी मत करो, फिर जब उनसे असली गांव घर की बात पूछा तो उन दोनों ने बोधगया में रुड़की मुहल्ला का रहने वाला बताया और कहा कि यही सही है. रामाबांध स्टैंड में भी इन दोनों की अच्छी कमाई हुई. लोगों ने बाल संत जान कर दान कर रहे थे. यहां तक कि लोगों ने दोनों बाल संतों के चरण भी छू रहे थे. थोड़ी देर में यहां से भी दोनों ने बस पकड़ ली.
इनके जाने के बाद बोधगया के रुड़की मुहल्ले से जानकारी ली गयी, तो बताया गया कि यहां रुड़की नाम का कोई मुहल्ला नहीं है. इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इतनी कम उम्र में इतनी चलाकी कहां तक जायज है. क्या इनके कच्चे उम्र में संस्कार की कमी रह गयी या संस्कृति इन पर हावी हो गयी? सवाल यह है कि जिन बच्चों के हाथ में कलम, कॉपी व किताब होनी चाहिए थी. आज उनके हाथ दान पाने के लिए बढ़ रहे हैं. इसमें दोष किसका है. अभी से ही इनकी यह स्थिति है तो आगे क्या होगी. सवाल यह भी उठता है कि क्या झूठ बोल कर अभी से ही पैसा कमाना कोई ख्वाब को पाना है? या गरीबी उनके ऊपर हावी है
