Arwal News: (निशिकांत) लगातार यूरिया और अन्य रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग से जिले की मिट्टी की सेहत बिगड़ती जा रही है. अधिक उत्पादन की होड़ में किसान एक फसल में प्रति एकड़ 5 से 7 बैग तक रासायनिक खाद का प्रयोग कर रहे हैं. इसका असर न केवल पर्यावरण पर पड़ रहा है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव दिख रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार रासायनिक खादों के अंधाधुंध उपयोग से मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी हो रही है. फसलों के पोषण के लिए जरूरी जीवांश कार्बन की मात्रा सामान्य स्तर से काफी नीचे पहुंच गई है.
मिट्टी जांच में सामने आई पोषक तत्वों की कमी
मिट्टी जांच प्रयोगशाला के एसी शिव कुमार गोस्वामी ने बताया कि वर्ष 2024-25 में जिलेभर से 4,700 मृदा नमूनों की जांच का लक्ष्य मिला था, जिसे शत-प्रतिशत पूरा किया गया. उन्होंने बताया कि जांच में जीवांश कार्बन की मात्रा 0.1 से 0.5 प्रतिशत पाई गई, जबकि सामान्य स्तर 0.5 से 0.8 प्रतिशत होना चाहिए. इसके अलावा मिट्टी में बोरान और जिंक की भी कमी पाई गई है.
विशेषज्ञों के मुताबिक जिंक की कमी से धान की फसल की रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है, जिससे कई प्रकार के रोग लगने का खतरा बढ़ जाता है. वहीं बोरान की कमी से गेहूं की फसल प्रभावित होती है और दाने कमजोर व कम चमकदार हो जाते हैं.
मिट्टी की उपजाऊ क्षमता पर पड़ रहा असर
सहायक निदेशक रसायन श्वेता प्रिया ने बताया कि जीवांश कार्बन मिट्टी की “जान” होता है. इसकी कमी से मिट्टी की उपजाऊ क्षमता सीधे प्रभावित होती है.
उन्होंने बताया कि मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीव पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण और कार्बनिक पदार्थों के अपघटन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इससे नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम जैसे पोषक तत्वों की उपलब्धता बनी रहती है. साथ ही मिट्टी की जलधारण क्षमता भी बेहतर होती है, जिससे उत्पादन बढ़ता है.
जैविक खेती अपनाने की अपील
विशेषज्ञों ने किसानों को हरी खाद, फसल चक्र और जैविक खाद अपनाने की सलाह दी है. उन्होंने कहा कि किसान ढैंचा, मूंग और उड़द जैसी फसलों की बुवाई करें तथा फसल अवशेषों को जलाने के बजाय डिकंपोजर का उपयोग करें. गोबर खाद और वर्मी कंपोस्ट के इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता और उर्वरा शक्ति बढ़ाई जा सकती है.
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