दम तोड़ रहा कुम्हारों का पुश्तैनी धंधा

करपी (अरवल) : आधुनिकता की चकाचौंध में कुम्हारों का पारंपरिक रोजगार विलुप्त होता जा रहा है. प्राचीन काल से चले आ रहे मिट्टी के बरतन का इस्तेमाल अब केवल पूजा-पाठ तक ही सीमित रह गया है. मानव सभ्यता का विकास होने के बाद मिट्टी के बरतन बनानेवालों को कुम्हार व प्रजापति कहा जाने लगा. जिले […]

करपी (अरवल) : आधुनिकता की चकाचौंध में कुम्हारों का पारंपरिक रोजगार विलुप्त होता जा रहा है. प्राचीन काल से चले आ रहे मिट्टी के बरतन का इस्तेमाल अब केवल पूजा-पाठ तक ही सीमित रह गया है. मानव सभ्यता का विकास होने के बाद मिट्टी के बरतन बनानेवालों को कुम्हार व प्रजापति कहा जाने लगा. जिले में इस जाति के लोगों की अच्छी आबादी है, लेकिन तकनीक व आधुनिकता की बयार में इनके पारंपरिक रोजगार समाप्ति की ओर है.
एक समय में इस जाति के लोग मिट्टी से बने बरतन, खपड़ा, घड़ा, सुराही, चुक्का, प्याली आदि बना कर जीविकोपाजर्न किया करते थे. परंतु विज्ञान के क्षेत्र में तरक्की से खपड़े की जगह तेजी से सीमेंट के बने करकट ने ले लिया है. इस तरह से घड़े व सुराही की जगह फ्रिज तथा प्याली की जगह प्लास्टिक से बने कप व गिलास ने ले लिया है.
इसी वजह से आधुनिक समाज के लोगों ने मिट्टी से बने बरतनों से नाता तोड़ लिया, जबकि मिट्टी के बने बरतनों में बने खाने ज्यादा जायकेदार माने जाते थे. इतना ही नहीं पर्यावरण व स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी मिट्टी से बने बरतनों का इस्तेमाल ज्यादा अच्छा माना गया है, परंतु आधुनिकता व फैशन की होड़ ने कुम्हारों को आर्थिक तंगी की ओर धकेल दिया है.
प्राचीन काल से चला आ रहा इनका पुश्तैनी धंधा अब दम तोड़ने लगा है. इसका एक कारण यह भी माना जाता है कि इस जाति के लोग आपस में संगठित नहीं हो सके हैं. पूर्व में शादी-विवाह में तरह-तरह के मिट्टी के बरतन व खिलौने का इस्तेमाल हुआ करता था, जो वर्तमान समय में बंद होता जा रहा है.

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