दीपक गुप्ता/कोईलवर/आरा आज भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले लोक कलाकार भिखारी ठाकुर की पुण्यतिथि है.उन्हें इस दुनिया से रुखसत हुए आज 55 साल हो गए.55 सालो के बाद भी उनकी रचनाएं नाटक गीत आज भी प्रासंगिक हैं.देश दुनिया मे उनकी विरासत को संभालने का क्रेडिट लेने वाले उनके जन्मदिवस और पुण्यतिथि पर उनकी याद में खूब कार्यक्रम और सभाएं करते हैं.हालांकि ये भेड़चाल अब कुछ ज्यादा ही हो गया है.
ऐसे में मलिक जी के नाम से मशहूर भिखारी ठाकुर की पहली पुण्यतिथि पर हुआ कार्यक्रम प्रासंगिक हो जाता है.मल्लिक जी की पहली पुण्यतिथि देश दुनिया मे सबसे पहले भोजपुर जिले के कोईलवर नगर के आज़ाद कला मंदिर के रंगमंच पर आयोजित की गई थी.पहली पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम मे बतौर अतिथि तब के मशहूर रेडियो कलाकार और लोहा सिंह नाटक के सूत्रधार रामेश्वर सिंह कश्यप पहुंचे थे.इस कार्यक्रम का जीवंत प्रसारण रेडियो पर बीबीसी हिंदी से भी किया गया था.
पुण्यतिथि समारोह का आयोजन कोईलवर के साहित्यकार रचनाकार कवि स्वo अयोध्या प्रसाद "''पागल शाहाबादी " ने अपने साथी स्वo रामप्रसाद ''बिस्मिल " के साथ मिलकर कराया था.कोईलवर के बड़े बुजुर्ग और उस कार्यक्रम को अपनी आंखों से देखने वाले लोग बताते हैं कि मल्लिक जी की पहली पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में दूर दूर से लोग आए थे.कार्यक्रम में लोहा सिंह नाटक की एकांकी प्रस्तुति भी रेडियो के मशहूर कलाकार रामेश्वर सिंह कश्यप ने की थी.
मंच का संचालन तब बिहार के पहले रेडियो कमेंटेटर बद्री प्रसाद यादव ने की थी.आयोजन समिति में आज़ाद कला मंदिर के मुनि प्रसाद सिंह,रामधार राम,रामेश्वर सिंह अबोध,रामप्रवेश राम,राजबल्लम सिंह ,बिंदेश्वरी सिंह और तालिब हाशिमी जैसे लोग थे जो अब इस दुनिया मे नही हैं.तब कार्यक्रम के आयोजक मण्डल में रहे संस्था के संरक्षक स्वo शिवशंकर प्रसाद अपनी स्मृतियों को ताजा करते बताते थे कि भिखारी ठाकुर की पहली पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में मंच पर रामेश्वर सिंह कश्यप और बद्री प्रसाद यादव समेत उस जमाने की कई नामचीन हस्तियां मौजूद थी.जिनमे रेडियो और साहित्य जगत के भी लोग थे. तब रामेश्वर सिंह का लोहा सिंह नाटक रेडियो पर बहुत प्रसिद्ध था.कार्यक्रम के दौरान उन्होंने उसका पाठ भी किया था.
तब दूसरी कक्षा में पढ़ रहे रंगकर्मी नरेंद्र स्वामी कहते हैं कि बचपन की धुंधली लेकिन मधुर यादें अब भी जीवंत है.स्मृतियों में खोते हुए कहते है कि भिखारी ठाकुर की पहली पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम की भीड़ मे मैं भी था.मंच पर उपस्थित अतिथियों ने उन्हें और उनकी रचनाओ को याद कर उन्हें प्रासंगिक बताया था.और कैसे रामेश्वर सिंह कश्यप ने अपनी नाटक का डायलॉग मंच पर सुनाया था.वही भिखारी ठाकुर के रिश्तेदार और भिखारी ठाकुर से जुड़े संस्मरणों को कई किताबों में लिपिबद्ध करने वाले स्वo रामदास राही कहते थे कि एक समय पूरा भोजपुरी भाषी क्षेत्र भिखारी ठाकुर की नाट्य क्रांति से अभिभूत था.
वे अक्सर कहते थे कि कोइलवर को भिखारी ठाकुर अपने गांव से अलग नहीं मानते थे. भिखारी की नाट्य यात्रा में कोइलवर का भी योगदान है. हालांकि रंगमंच की वर्तमान दुर्दशा और भिखारी ठाकुर के नाम पर चल रही अनगिनत संस्थाओं पर वे आजीवन सवाल उठाते रहे. भिखारी ठाकुर का रहा है कोइलवर से नाता भिखारी ठाकुर के जन्म स्थान और जन्म तिथि को लेकर विवाद उनके जीवन में ही शुरू हो गया था. जन्म स्थान कुतुबपुर है यह तो भिखारी ठाकुर की रचना से ही स्पष्ट है मगर गंगा, सोन और सरयू के संगम पर बसा यह दियारा क्षेत्र नदियों की बदलती धार और कटाव के चलते विवादित रहा है.
पहिल बास रहल भोजपुर में, मौजे अरथू अवारी, पुरखा पाँच बसलन, शंकरपुर जानत सब नर नारी। भिखारी ठाकुर की ही रचनाओं पर गौर करें तो भिखारी ठाकुर के पूर्वज तत्कालीन शाहाबाद के डुमरांव के अरथू अवारी से आकर बड़हरा के बबुरा गांव जो उस वक्त सात टोलों में विभक्त था उसकी एक पट्टी शंकरपुर महाल में आकर बस गए. 16 वीं शताब्दी में कुतुबुद्दीन जमींदार के द्वारा कुतुबपुर बसाया गया.शंकरपुर के गंगा कटाव में विलुप्त हो जाने के बाद बबुरा के दक्षिण बगीचे में आ गए.गंगा के कटाव और लगातार बदलती धार से बस्ती और बाशिंदों का लगातार विस्थापन होता रहा.कभी गंगा बस्ती के दक्षिण बहती थी जिसे भिखारी ठाकुर ने लिखा भी है. दक्षिणी बहे गंगा की धारा, नाई वंश में जन्म हमारा। आज गंगा कुतुबपुर के उत्तर में है.पहले छपरा के डोरीगंज घाट से नाव से गंगा पारकर फिर थोड़ी दूर पैदल चलकर उनके गांव जाना पड़ता था.
या आरा से पटना के बीच स्थित कोइलवर उतरकर बबुरा होते हुए जाने का मार्ग था. बीच में गंगा का एक भागड़ भी है जिसे पार करना दुष्कर था. मगर आज नया सड़क पुल बन जाने से आवागमन अपेक्षाकृत सरल हो गया है.कहना अतिश्योक्ति न होगा कि कोइलवर से भिखारी ठाकुर का पुराना रिश्ता रहा है और ना जाने कितनी बार कोइलवर की सोनहुली माटी पर भिखारी ठाकुर के चरण पड़े होंगे. भिखारी के नाटकों की विषयवस्तु और सामाजिकता दियारे की मुख्य फसल रबी और मक्का पहले भी थी, आज भी है.खेती की निर्भरता प्रकृति और बाढ़ सुखाड़ के चक्र पर आश्रित थी. बाकी जो शेष रहता था वो सामंती व्यवस्था के शोषण के बाद जो थोड़ा बहुत बचा. पलायन आज भी इस क्षेत्र की एक प्रमुख विशेषता है. भिखारी का भी पलायन रोजी रोटी की तलाश में हुआ और बंगाल से भिखारी जब दुबारा अपने गांव लौटे तो उनके साथ बंगाल की रंग–संस्कृति, पुनर्जागरण आंदोलन, धार्मिक आंदोलनों का प्रभाव था. अपने लोकनाटकों की रचना में भिखारी ने इन सभी को समकालीन और आसपास के गांवों की समस्याओं से जोड़कर इसे लोकप्रिय बना दिया.
भिखारी ठाकुर की चर्चित रंगमंडली के सभी सदस्य अब लगभग शेष नहीं रहे. अब उनके नाटक भी उस रूप में नहीं रहे.भिखारी ठाकुर के नाटकों का भी शहरीकरण हुआ है और कथावस्तु में परिवर्तन के साथ नाटक पेश किए जा रहे हैं, पर भिखारी के समय की समस्याएं उस काल से भी जटिल हैं, ना पलायन रुका है ना कुसंस्कृति का प्रहार.ऐसे में भिखारी ठाकुर के लोकनाटको की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है. मरने से 20 दिन पहले आये थे कोईलवर गांव के बुजुर्ग बताते है कि उस जमाने मे भिखारी ठाकुर के कला की तूती बोलती थी.बड़े और धनाढ्य लोग अपने शादी विवाह से लेकर अन्य प्रयोजनों में भी उन्हें अपने नाटकों की प्रस्तुति के लिए ससम्मान बुलाते थे.
अपने कला जीवन के शुरुआत से ही वे कोईलवर आते रहे हैं.लोग उन्हें खूब सम्मान देते थे.कोईलवर वार्ड 03 के संजीत सिंह बताते हैं कि 20 जून 1971 को उनके बाबा स्व0 बिंदेश्वरी सिंह की बहन प्रभा सिंह की शादी में जिले के छोटका लौहर से बारात आई थी.तब बारात में मरजाद का चलन था.भिखारी ठाकुर उस बारात में असवारी पर चढ़ कर आये थे और अपनी मण्डली के साथ दो दिनों तक 800 बारातियों के बीच अपने नाटकों की प्रस्तुति दी थी. तब से लेकर आजीवन उनका कोईलवर से नाता जुड़ा रहा. भिखारी ठाकुर के नाम पर नही हो सका पुल का नामकरण
