भारतीय जनता पार्टी (BJP) अररिया के जिला प्रवक्ता अविनाश कुमार सिंह ने आंदोलन या प्रदर्शन के नाम पर होने वाली हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ के मामलों में मुकदमों की वापसी को लेकर कड़ा रुख अपनाया है. उन्होंने कहा है कि यदि कोई भी राज्य अथवा केंद्र सरकार हिंसा, पुलिस पर हमला या सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे गंभीर मामलों में दर्ज मुकदमों को वापस लेती है, तो ऐसे फैसलों पर न्यायपालिका (Court) को स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लेना चाहिए.
"हिंसा और तोड़फोड़ लोकतांत्रिक अधिकार नहीं"
भाजपा प्रवक्ता अविनाश कुमार सिंह ने आंदोलन की आड़ में होने वाले आपराधिक कृत्यों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा:
- संवैधानिक सीमाएं: शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक आंदोलन करना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इसकी आड़ में सरकारी व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, पुलिस बल पर हमला करना, पत्रकारों के साथ मारपीट करना और कानून-व्यवस्था को चुनौती देना बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है.
- कानून का शासन होगा कमजोर: उन्होंने कहा कि यदि बिना किसी ठोस और वैधानिक आधार के ऐसे गंभीर मुकदमे वापस लिए जाते हैं, तो इससे समाज में अपराधियों का मनोबल बढ़ेगा और विधि का शासन (Rule of Law) कमजोर होगा.
आदतन अपराधियों को न मिले छूट का लाभ
अविनाश कुमार सिंह ने स्पष्ट किया कि केस वापसी के निर्णयों में निष्पक्षता और साक्ष्यों का ध्यान रखा जाना चाहिए:
- आपराधिक इतिहास की हो जांच: यदि किसी आरोपी का पूर्व से आपराधिक इतिहास (Criminal Antecedents) रहा है, वह आदतन अपराधी है या उसके खिलाफ पुख्ता सबूत मौजूद हैं, तो उसे महज 'आंदोलनकारी' का टैग देकर राहत नहीं दी जानी चाहिए.
- साक्ष्य आधारित न्याय: प्रत्येक मामले में निर्णय केवल कानून, उपलब्ध साक्ष्यों और न्याय के सर्वमान्य सिद्धांतों के आधार पर ही होना चाहिए.
न्यायपालिका से स्पष्ट दिशा-निर्देश (Guidelines) जारी करने की मांग
अररिया भाजपा प्रवक्ता ने न्यायपालिका से अपील करते हुए कहा:
अविनाश कुमार सिंह का वक्तव्य: "संविधान और कानून का शासन ही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है. न्यायपालिका को यह पूरी तरह स्पष्ट करना चाहिए कि किन विशेष परिस्थितियों और वैधानिक आधारों पर मुकदमों की वापसी संभव हो सकती है, ताकि राजनीतिक या प्रशासनिक स्तर पर कानून का दुरुपयोग न किया जा सके. कोर्ट को इस संबंध में सख्त गाइडलाइन जारी करनी चाहिए."
