फारबिसगंज. आचार्य श्री महाश्रमणजी के सुशिष्य मुनिश्री प्रशांत कुमार जी मुनिश्री कुमुद कुमार जी के सान्निध्य में तेरापंथ भवन में आयोजित प्रवचन को संबोधित करते हुए मुनिश्री प्रशांत कुमार जी ने कहा कि चिंतामणि रत्न, कामधेनु, कल्पवृक्ष को दुर्लभ बताया गया है. आगम सूत्र में मनुष्यत्व को दुर्लभ बताया. मनुष्य होने बड़ी बात नहीं है भीतर में मनुष्यत्व का भाव होना चाहिए. जिसके भीतर मानवीय चेतना जागृत रहती है उसमें करुणा, सद्भावना,अहिंसा का भाव अपने आप होता है. वर्तमान समय में दुनिया भर में हिंसा बढ़ती जा रही है.अहंकार व स्वार्थवादी मनोवृत्ति के कारण समस्याएं बढ़ती जा रही है. मनुष्य जन्म पाकर इसे सकारात्मक कार्य में नियोजित करें. अपने कार्य,चिंतन, आचरण व व्यवहार से इसे सार्थक बनाएं. पांचों इन्द्रिय का सदुपयोग करें. अध्यात्म का मुख्य उद्देश्य जीवन में सुख, शांति व संतोष बना रहें. मानव जीवन सौभाग्य शाली को ही प्राप्त होता है. तामसिक भोजन व्यक्ति के मन के भाव को बिगाड़ता है.चंचल प्रवृत्ति को बढ़ाता है.मन में विकृतियां पैदा करता है.
मानव जीवन सौभाग्यशाली को ही प्राप्त होता है: मुनि प्रशांत
अध्यात्म का मुख्य उद्देश्य जीवन में सुख, शांति है
