Aaj Ka Darshan: बिहार के Araria जिले में भारत-नेपाल सीमा के पास स्थित Sundarnath Dham सिर्फ एक शिव मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और पौराणिक कथाओं का जीवंत संगम है. सुंदरी मठ के नाम से प्रसिद्ध यह प्राचीन धाम इन दिनों श्रद्धालुओं और पर्यटकों के बीच खास आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. मान्यता है कि महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने यहां समय बिताया था और माता कुंती ने एक हजार कमल के फूलों से भगवान शिव की पूजा कर शिवलिंग की स्थापना की थी.
नेपाल के बिराटनगर के समीप डुमरिया पंचायत में स्थित यह मंदिर भारत और नेपाल की साझा सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है. यहां हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं, जबकि शिवरात्रि के दौरान लाखों भक्त जलाभिषेक करने आते हैं.
पांडवों की कथाओं से जुड़ा है सुंदरनाथ धाम
स्थानीय लोगों के अनुसार इस क्षेत्र में आज भी ऐसे कई स्थान मौजूद हैं, जिन्हें भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव की कथाओं से जोड़कर देखा जाता है. डुमरिया पंचायत के निवासी बताते हैं कि बचपन से वे गांडीव रखने और पांडवों के विश्राम स्थल से जुड़ी कहानियां सुनते आए हैं. यही वजह है कि यह धाम सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि लोककथाओं और स्मृतियों का भी केंद्र है.
1935 ईस्वी में गढ़बनैली के राजा कुलानंद सिंह ने यहां पक्का मंदिर बनवाया था. समय के साथ मंदिर का विस्तार हुआ और अब यह एक भव्य धाम का रूप ले चुका है. मंदिर समिति और स्थानीय लोगों की सक्रिय भूमिका इसके विकास में महत्वपूर्ण रही है.
राजकीय मेले का दर्जा मिलने के बाद बदली तस्वीर
शिवरात्रि मेले को बिहार सरकार ने राजकीय मेले का दर्जा दिया है. पर्यटन स्थल घोषित होने के बाद मंदिर के विकास के लिए करीब 14 करोड़ रुपये की राशि भी स्वीकृत की गई, जिससे यहां निर्माण और सौंदर्यीकरण का कार्य जारी है.
सिकटी विधायक और पूर्व मंत्री Vijay Kumar Mandal के प्रयासों को भी मंदिर के विकास में अहम माना जाता है. धार्मिक न्यास परिषद से जुड़ने के बाद यहां सुविधाओं का तेजी से विस्तार हुआ है.
सुबह 4 बजे खुलता है मंदिर का कपाट
मंदिर के महंत Singheshwar Giri के अनुसार प्रतिदिन सुबह 4 बजे पूजा-अर्चना के बाद गर्भगृह श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया जाता है. शाम 6 बजे संध्या आरती और श्रृंगार पूजा के बाद मंदिर का कपाट बंद कर दिया जाता है.
आज भी सुंदरनाथ धाम में आस्था और इतिहास एक साथ सांस लेते दिखाई देते हैं. यही कारण है कि यह धाम सीमाओं से परे करोड़ों श्रद्धालुओं की श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है.
अररिया से मृगेंद्र मणि सिंह की रिपोर्ट
