अररिया : बीते लगभग एक दशक से जिले में मजदूरों, विशेष रूप से मनरेगा जॉबकार्ड धारकों के अधिकारों की आवाज बुलंद करने वाली संस्था जन जागरण शक्ति संगठन का मानना है कि स्थानीय स्तर पार काम देकर पलायन रोकने के लिए बनायी गयी मनरेगा योजना का समुचित लाभ कामगारों को नहीं मिल रहा.
योजना कमोबेश विफल है. यही वजह है कि जिले के मजदूरों का अन्य प्रदेशों में पलायन जारी है. मजदूर दिवस के उपलक्ष्य में प्रभात खबर से खास बातचीत में संगठन की सक्रिय सदस्य कामयनी स्वामी ने कहा कि वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक राज्य में खेतिहर मजदूरों की संख्या 53 प्रतिशत है. जबकि श्रमिकों के श्रेणी में जिले के 65 प्रतिशत श्रमिक खेतिहर मजदूर है. स्थानीय स्तर पर काम नहीं रहने के कारण मजदूर पलायन करने को मजबूर होते हैं. पर वहां उन्हें तरह तरह के शोषण का शिकार होना पड़ता है.
ठेकेदारों से ठगे जाते हैं. पेमेंट रोक कर जबरदस्ती काम कराया जाता है. अधिक वजन उठाने पर क्षमता से अधिक मेहनत के कारण उन्हें तरह तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ता है. कामायनी स्वामी कहती हैं कि स्थिति के मद्देनजर जिले में मनरेगा का खास महत्व है. पर आलम ये है कि पिछले चार सालों से मनरेगा की मजदूरी 177 रुपये प्रति दिन पर टिकी हुई है. जबकि सातवां वेतन आयोग आ चुका है.
जिले में मनरेगा को विफल बताते हुए वे कहती हैं कि योजना के तहत हर ग्रामीण मजदूर परिवार को स्थानीय पंचायत में ही हर साल 100 दिन का रोजगार मुहैया कराना है. पर जमीनी सच्चाई कुछ अलग है. वर्ष 2017-18 के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि बिहार में औसतन एक परिवार को 36 दिन का काम मिला. पर जिले का औसत केवल 25 दिन काम का है. वहीं केवल 65 परिवार ऐसे रहे जिन्हें बीते वित्तीय वर्ष में 100 दिन का काम मिला. जबकि जॉबकार्ड धारकों की संख्या पांच लाख के करीब है.
योजना का लाभ निर्माण कार्य के मजदूरों के अलावा राज मिस्त्री, उनके हेल्पर, पेंटर, लोहार, बढ़ई, बिजली व टाइल मिस्त्री, इंट भट्टा मजदूर व कम से कम 50 दिन काम करने का अनुभव रखने वाले मनरेगा मजदूर ले सकते हैं. अन्य मजदूरों को कम से कम 90 दिन काम करने का प्रमाण पत्र देना होगा. बताया गया कि निर्माण श्रमिकों के लिए संचालित योजनाओं में मातृत्व लाभ, विवाह सहायता, मृत्यू हित लाभ, पेंशन, परिवार पेंशन, दाह संस्कार सहायता व औजार व साइकिल क्रय विशेष अनुदान आदि शामिल हैं. पंचायत वार शिविर लगा कर निर्माण श्रमिकों का निबंधन किया जा रहा है. अब तक लगभग 100 शिविर लगाये जा चुके हैं. 10 हजार श्रमिकों का पंजीयन किया गया है.
बिहार राज्य प्रवासी मजदूर दुर्घटना अनुदान योजना
योजना का लाभ वैसे मजदूर ले सकते हैं जो राज्य के बाहर असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं. इस योजना के तहत स्वाभाविक मृत्यु पर अनुदान नहीं है. पर दुर्घटना मृत्यु होने पर उनके आश्रितों को एक लाख रुपये की अनुदान राशि दी जाती है. आयु सीमा 18 से 65 वर्ष है. दी गयी जानकारी के मुताबिक योजना के तहत दुर्घटना में स्थायी या आंशिक अपंगता के मामलों में भी 37 हजार 500 से 75 हजार तक अनुदान की राशि दिये जाने का प्रावधान है.
भवन व अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड की योजनाएं :निर्माण कामगारों के कल्याण व सामाजिक सुरक्षा के लिए बिहार भवन एंव अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड द्वारा भी कई तरह की योजनाओं का संचालन हो रहा है. योजना के लाभ के लिए कामगारों का बोर्ड में पंजीयन जरूरी है. पंजीयन जिला श्रम अधीक्षक कार्यालय द्वारा किया जाता है. शुल्क कुल मिला कर 30 रुपये हैं. साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि राजनीति बदलने की क्षमता रखने वाले मजदूर अब जागरूक हो रहे हैं. वे कमजोर नहीं रहे. शोषण के खिलाफ संघर्ष को तैयार हैं. संघर्ष कर भी रहे हैं. मजदूरों की मांग है कि हर हाथ को काम, काम का पूरा दाम व बूढ़ापे में आराम.
मजदूर उठा सकते हैं योजनाओं का लाभ
राज्य सरकार मेहनतकश मजदूरों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चला रही है. आवश्यक जानकारी हो तो राज्य के भीतर या अन्य प्रदेशों में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर योजनाओं का लाभ उठा सकते हैं. राज्य सरकार मजदूरों के कल्याण व सामाजिक सुरक्षा के लिए तीन महत्वपूर्ण योजनाएं चला रही है. योजनाओं का कार्यान्यवन श्रम कार्यालय द्वारा होता है.
कामगार व शिल्पकार सामाजिक सुरक्षा योजना : जिला श्रम अधीक्षक कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार ये योजना उन श्रमिकों व शिल्पकारों के लिए हैं जो बिहार राज्य में असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं. योजना का लाभ केवल 18 से 65 वर्ष के बीच के ही कामगारों को मिलेगा. योजना के तहत स्वाभाविक मृत्यु होने पर भी आश्रितों को 30 हजार अनुदान की राशि मिलेगी.
दुर्घटना मृत्यु पर राशि एक लाख होगी. जबकि असाध्य रोगों के चिकित्सा सहायता के लिए सात हजार 500 से लेकर 30 हजार रुपये तक का प्रावधान है. इसके अलावा दुर्घटना में निशक्त होने पर भी अनुदान है. मजदूरों का कहीं भी निबंधित होना जरूरी नहीं हैं
